इस समाज की स्थापना 1873 में पुणे में ज्योतिबा फुले के द्वारा की गई थी। ज्योतिबा फुले जाति के माली थे, इन्होंने विपरीत परिस्थितियों में पुणे जैसे कट्टरता के गढ़ में सामाजिक विषमताओं के खिलाफ अकेले ही लड़ाई की।
- उनके द्वारा स्थापित समाज के विचार निम्न थे -
- ईश्वर एक है ।
- प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर भक्ति का अधिकार है इसमें किसी मध्यस्थ या दल की आवश्यकता नहीं है।
- कोई भी ग्रंथ ना तो ईश्वर प्रनीत है और ना ही वह पूर्ण रूपेण प्रमाण के रूप में उपलब्ध है।
- परमेश्वर शारीरिक रंग, रूप में अवतार धारण नहीं करता।
- पुनर्जन्म, कर्मकांड , जप, तप तथा धर्म गोष्ठियों अज्ञान मूलक है ।
ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज ब्राह्मण वर्चस्व व उच्च जातियों द्वारा समाज के निम्न जातियों के बौद्धिक व सामाजिक शोषण के विरुद्ध एक आंदोलन बन कर उभरा था। इन्होंने गुलामगिरी नामक पुस्तक की रचना की। 1885 में संसार नामक पत्रिका को प्रारंभ किया जिसमें सत्यशोधक समाज के उद्देश्य तथा आंदोलनों की चर्चा होती थी ।
इन्होंने एक पुस्तिका कैफियत भी लिखी जिसमे अस्पृश्यता की दयनीय दशा के बारे में लिखा गया। इस प्रकार ज्योतिबा फुले ने वैचारिक क्रांति लाने का प्रयास किया उन्होंने ही एक प्रसिद्ध पुस्तक Eho were the shudras की भी रचना की थी