सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता

संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता निम्न प्रकार से सुनिश्चित की गई-
सर्वोच्च नयायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लिया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा
संसद के दोनों सदन द्वारा समर्थित आवेदन पर ही साबित कदाचार अथवा असमर्थता के आधार पर हटाया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के भत्ते, छुट्टी एवं पेंशन संसद व निर्धारित किए जाते हैं तथा उन्हें उनकी पदावधि के दौरान कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासनिक व्यय तथा न्यायालय के न्यायाधीशों एवं कर्मचारियों के वेतन भत्ते आदि भारत के संचित निधि पर भारित होते हैं। अतः संसद द्वारा उन पर मतदान नहीं किया जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय अथवा (किसी उच्च न्यायालय) के किसी न्यायाधीश के आचरण के संबंध में संसद अथवा (किसी राज विधान मंडल) में कोई बहस नहीं की जा सकती, शिवाय उन्हें उनके पद से हटाए जाने की प्रक्रिया के क्रम में राष्ट्रपति के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने के प्रस्ताव के समय।

संविधान द्वारा यह आधिनियमित किया गया है की सेवानिवृत्ति के पश्चात उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भारत में किसी भी न्यायालय में अथवा किसी अन्य प्राधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता।

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