नीति निदेशक तत्वों का निहितार्थ एवं प्रकृति-

 →भारतीय संविधान के भाग →4 में वर्णित नीति निदेशक तत्व हमारे राज्य के सम्मुख कुछ आदर्श प्रस्तुत करते हैं जिनके द्वारा देश के नागरिकों का सामाजिक आर्थिक एवं नैतिक उत्थान हो सकता है यही कारण है कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस संबंध में कहा था कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उद्देश्य जनता के कल्याण को प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है निदेशक तत्वों की प्रकृति को स्पष्ट करते समय श्री G. N.जोशी ने लिखा कि इन नीति निदेशक तत्वों का विधान मंडल को कानून बनाते समय और कार्यपालिका को इन कानूनों को लागू करते समय ध्यान रखना चाहिए यह उस नीति की ओर संकेत करते हैं जिसका अनुसरण संघ और राज्यों को करना चाहिए नीति निदेशक तत्वों के निहितार्थ को स्पष्ट करते हुए दुर्गा दास बसु ने उल्लेखित किया है कि अधिकांश निर्देशों का लक्ष्य आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करना है जिसका संकल्प उद्देशिका से लिया गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं की नीति निदेशक तत्वों के माध्यम  से दिशा का भी निर्धारण किया गया है जिस और भारत राज्य को निरंतर आगे बढ़ते रहना है |

डॉक्टर एमबी पायली ने -भारतीय संविधान में लिखा है कि -(यह सिद्धांत प्रजातंत्र आत्मक भारत का शिलान्यास करते हैं )जब भारत सरकार इन्हें कार्य रूप में परिणत कर सकेगी तो भारत एक सच्चा लोक कल्याणकारी राज्य पहला सकेगा यहां पर उल्लेखनीय है कि उद्देश्य का मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्व सभी एक ही संविधान के ढांचे के अभिन्न अंग हैं यह सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और उन्हें एक दूसरे के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए|

-डॉ सुभाष कश्यप के अनुसार उद्देश्य क्या मूल अधिकार और निदेशक तत्वों के  शीर्षक के अंतर्गत संविधान योजना मैं समतावादी समाज के निर्माण पर और सामाजिक आर्थिक न्याय की संकल्पना पर बल दिया गया है|

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