अरावली पर्वत

अरावली पर्वत का विस्तार  दिल्ली से दक्षिण पश्चिम से आरंभ होकर गुजरात की पलनापुर तक तथा उत्तर पुर्व से दक्षिण पश्चिम दिशा में लगभग 800 किलोमीटर  लंबाई तथा भारत के इस प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला का विस्तार है यह विश्व के प्राचीनतम पर्वत श्रेणियों में से एक है यहां प्रायद्वीपीय पठार के आकियन शील्ड का एक भाग है जो नीस(nees) लाल बलुआ पत्थर ,संगमरमर, मार्वल चट्टानों  से निर्मित है विंध्या तथा अरावली एक दूसरे से ग्रीन बाउंड्री फॉल्ट (वृहद सीमांध्र भ्रंश) के द्वारा अलग होते हैं अरावली के ऊपरी भाग में धारवाड़ क्रम की चट्टानें तथा आंतरिक भाग में आर्कियन क्रम की चट्टाने मिलती हैं। इसमें स्लेट तथा सिलाइट चट्टाने भी मिलती हैं। इसे अलग-अलग भागों में भिन्न-भिन्न नाम से जाना जाता है जैसे- उत्तर से दक्षिण रायसीना की पहाड़ियां ,अलवर की पहाड़ियां ,सवाई माधोपुर का पहाड़ियां ,बूंदों की पहाड़ियां ,आबू की पहाड़ियां ,डूंगरपुर का पहाड़ियां इत्यादि नाम से जाना जाता है इसके प्रमुख  श्रेणियों में प्रिकेम्बियन काल का  र्क्वाट जाइट अधिक मिलता है। जिससे स्पष्ट होता है कि अरावली की उत्पत्ति 570 मिलीयन वर्ष पूर्व कैंब्रियन काल  मे हुआ। उत्पत्ति के आधार पर यहां एक   मोड़दार वलित पर्वत है। परंतु वर्तमान समय में हजारों वर्षों की  अनाच्छादन के पश्चात यह केवल  अवशेष रूप में बचा है । अरावली की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर  1722 मीटर आबू की पहाड़ी पर स्थित है। आबू पहाड़ की ढाल को राजस्थान राज्य का शिमला कहते हैं। कुछ भू वैज्ञानिकों ने मथुरा के गोवर्धन वृंदावन  श्रेणी को अरावली का विस्तार माना है। अरावली के लाल बलुआ पत्थर से ही दिल्ली का लाल किला, आगरा का किला, राष्ट्रपति का भवन, हुमायूं का मकबरा और मजनू का टीला बनाया गया है।
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