भूमिकर व्यवस्था-2

1786 का एक्ट-कार्नवालिस गवर्नर जनरल और मुख्य सेनापति दोनांे की शक्तियाँ लेना चाहता था। इस अधिनियम के तहत स्वीकार किया गया कि विशेष अव्यवस्था में अपने परिषद के निर्णय को रद्द करने का अधिकार गर्वनर जनरल को दे दिया गया।

      1793 का चार्टर का एक्ट-कम्पनी के अधिकारों को 20 वर्ष के लिये बढ़ा दिया गया परिषद के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार जो कार्नवालिस को दिया गया था उसे आने वाले गवर्नर जनरल को भी दे दिया गया।

      बोर्ड आफ कन्ट्रोल के अधिकारियों का वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा।

      1813 का चार्टर एक्ट-कम्पनी का अधिकार 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया और कम्पनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त हो गया यद्यपि चाय, चीनी के व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।

      कम्पनी को भारत में शिक्षा पर एक लाख रूपये में खर्च करने का प्रत्यक्ष प्रावधान था।

      1833 का चार्टर एक्ट-कम्पनी का राजनैतिक अधिकार 20 वर्षो के लिए पुनः बढ़ा दिया गया।

1.    कम्पनी का व्यापारिक अधिकार चाय तथा चीनी से भी पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।

2.    भारत के प्रशासन का केन्द्रीयकरण कर दिया गया।

3.    बंगाल का गर्वनर जनरल भारत का गर्वनर बना दिया गया।

4.    विधि आयोग की नियुक्ति की गयी।

5.    इस एक्ट की धारा 87 में यह व्यवस्था की गयी कि जाति वर्ग के आधार पर सरकारी सेवा मंे भेद-भाव समाप्त कर दिया गया।

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