एक सिंचाई तंत्र, नहर, नदी, नलकूप, तालाब इत्यादि द्वारा पोषित क्षेत्रों को कमान क्षेत्र कहा जाता है। विशेष रूप से प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के अंतर्गत सिंचाई क्षमताओं के अनुकूलतम उपयोग हेतु कमान क्षेत्रों का एकीकृत नियोजित विकास आवश्यक हो जाता है । 1995-96 के अंत तक 79.89 मिली हेक्टेयर क्षमता का उपयोग हुआ। जबकि निर्मित क्षमता 89.44 मिली हेक्टेयर थी। क्षमता एवं उपयोग का यह अंतर निम्नलिखित कारणों से पैदा होता है-
- सिंचाई के जल को खेतों में ले जाने हेतु अनिवार्य आधार संरचना चैनल अपवाह इत्यादि का अभाव।
- सिंचित परिस्थितियों के तहत उपयुक्त कृषि पद्धतियों के व्यापक प्रयोग में कमी।
- किसानों के मध्य जागरूकता का अभाव।
- नेहरू के हीनतर रखरखाव एवं रिसाव आदि के कारण जल की हानि।
इन कारणों से उत्पन्न अति सिंचाई से जल क्रांति एवं क्षारीयता कि समस्या पैदा होती है जबकि दूसरी ओर अपर्याप्त सिंचाई फसल उत्पादन को नुकसान पहुंचाती है ।
कमान क्षेत्र कार्यक्रम के मूल उद्देश्य:-
- अधिकाधिक क्षेत्र के सिंचाई करण जल की व्यर्थ हानि के निस्तारण तथा बेहतर कृषि पद्धतियों के माध्यम से भूमि एवं जल की प्रति इकाई उत्पादकता में सुधार जैसे उपाय द्वारा मूल्यवान भूमि एवं जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना ।
- सिंचाई जल का समानतापूर्ण वितरण के मुख्य अंग इस प्रकार है -
- भूमि समतलीकरण एवं संरूपण ।
- अपवाह एवं चैनलों का निर्माण।
- जोत सीमाओं का पुनर संयोजक एवं चकबंदी।
- सिंचाई जल के न्याय पूर्ण वितरण हेतु समुचित बाड़- बंदी प्रणाली का निर्माण।
- साख एवं विस्तार सेवाओ आगतों तथा सेवाओं के प्रभाव को दुरुस्त बनाना।
- सड़क, बाजार, भंडारण, पेयजल जैसी मूल आधारभूत सुविधाओं की स्थापना।
- उपयुक्त कृषि पद्धतियों का चुनाव एवं अंगीकरण ।
- तल सिंचाई के अनुपूरक के रूप में भूमिगत जल संसाधनों का विकास करना।