भारत में पंचायती राज व्यवस्था का मूल्यांकन-

भारत में पंचायती राज व्यवस्था की संरचना वस्तुतः प्राचीन इतिहास के प्रत्यक्ष लोकतंत्र की तर्ज पर की गई है इसके पीछे स्थानीय स्वशासन का सिद्धांत है कि सरकार की निचली इकाइयों को सत्ता का अधिकतम हस्तांतरण हो तथा लोकप्रिय निर्वाचन से गठित स्थानीय संस्थाओं के जरिए स्वशासन सुनिश्चित किया जाए ऐसी स्थिति में महिलाओं का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि जहां एक और उसके प्रतिनिधित्व के अभाव में संपूर्ण लोकतंत्र संरचना अपूर्ण  रहेगी |वहीं दूसरी और उनमें सशक्तिकरण के अभाव में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया अधूरी रहेगी यही कारण है कि महिलाओं को पंचायतों के माध्यम से सशक्त बनाने का प्रचार किया जा रहा है (पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी जिला पंचायत में 41% मध्यवर्ती पंचायत में 40% ग्राम पंचायत में 40% लगभग तीनों स्तरों पर 33% स्थान आरक्षित हैं )यह उनकी स्थिति में व्यापक बदलाव आया है|

पंचायती राज व्यवस्था में नई भर्तियों के हार से कतिपय समस्याएं उत्पन्न हुई जैसे चुनाव दल बंदी के आधार पर होने लगे हैं जिससे जातिवाद एवं सामाजिक समरसता के समक्ष संकट व चुनौतियां उत्पन्न होती हैं पंचायतों के पास अपने आय के साधन अतिथि में थे जिससे या प्रभावी कार्य करने में पूर्णतया सक्षम नहीं हैं योग्य व्यक्ति स्थानीय शासन व्यवस्था का अंग बनने से कतराते हैं जिससे भाई भतीजा वाद और भ्रष्टाचार का तंत्र विकसित होने लगा है सरकारी तंत्र के अत्यधिक अंकुश के कारण यह मूल उद्देश्य से भटकने लगा है ग्रामीण जनसंख्या का ही पंचायतों से आस्था खत्म होने लगी है|

-निष्कर्ष का पंचायती राज प्रणाली की वैचारिक अवधारणा स्वशासन है जिसका आधार शासन व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी है अतः पंचायती राज के सफलता जीवंत ग्राम सभा पर निर्भर है जो तृणमूल स्तर पर लोकतंत्र को समृद्धि प्रदान करता है परंतु चेतना की कमी से आम आदमी इस मंच से ग्रामीण विकास के कार्य में बहुत सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहा है प्रायः गांव ग्राम सभा की बैठकों में ग्रामीण जन की उपस्थिति अत्यंत निम्न होती है अतः इस संदर्भ में पंचायत संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह आम आदमी की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में अपना योगदान करें|

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