भारतीय इस्लाम को बचाना क्यों ज़रूरी है?

•आमिर ने असहिष्णुता पर अपना बयान 'अंतरराष्ट्रीय आंतकवाद और इस्लाम' के प्रसंग में मौजूदा स्थिति पर दिया है.
•पेरिस और माली के चरमपंथी नरसंहार के बाद भारत ही नहीं, कई यूरोपीय देशों में भी मुसलमानों और इस्लाम की भूमिका पर बहस छिड़ी हुई है.
•इस्लाम के नाम पर इस्लामिक स्टेट, अलक़ायदा, बोको हराम और उन जैसे कई अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों का उदय और उनके माध्यम से दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में किए जाने वाले नरसंहार और हत्याओं से भारत के मुसलमान घबराए हुए हैं.
•भारत के इतिहास में शायद यह पहला मौक़ा है जब मुसलमानों के विभिन्न पंथों और समुदायों के एक हज़ार से अधिक धार्मिक नेताओं और विद्वानों ने आईएस के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किए हैं.
•इन फ़तवों में कहा गया है, ''इस्लाम हर तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ है जबकि आईएस नरसंहार का दोषी है."
•ये फ़तवे कई महीनों में पूरे देश से इकठ्ठा किए गए हैं. 15 जिल्दों में बंधे ये फ़तवे संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून और दुनिया के अन्य नेताओं को भेजे गए हैं.
•इन नेताओं के नाम लिखे एक पत्र में कहा गया है, "इस्लाम हर रूप में चरमपंथ के विरूद्ध है, चाहे उसका उद्देश्य कुछ भी हो."
•इसमें कहा गया है कि ये फ़तवे उन्हें इस उद्देश्य से भेजे जा रहे हैं ताकि उन्हें बताया जाए कि भारत के 16 करोड़ मुसलमान हिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं.
•भारत के मुसलमान इस समय दोहरे दबाव से गुज़र रहे हैं. एक तरफ़ वे लेबनान, पेरिस और माली जैसी चरमपंथी घटनाओं और आईएस, बोको हराम और अल-शबाब जैसे सुन्नी चरमपंथी संगठनों के उदय से धार्मिक तौर पर टूटे हुए और दुखी महसूस कर रहे हैं तो दूसरी ओर वह देश के अंदर हिंदू कट्टरवाद के निशाने पर हैं.
•देश में हिंदू विचारधारा वाले संगठनों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का एक व्यवस्थित आंदोलन चला रखा है. टीवी चैनलों, अख़बारों, सोशल मीडिया पर इस्लाम विरोधी और मुसलमान विरोधी भावनाएं व्यक्त की जा रही हैं.
•नफ़रत फैलाने के लिए सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका में बसे मुसलमानों के हवाले से तरह-तरह की घृणित कहानियां फैलाई जा रही हैं.
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