साइमन कमीशन
ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में (यानी निर्धारित समय से 2 वर्ष पूर्व )नए संविधान में भारत की स्थिति का पता लगाने के लिए सर जॉन साइमन के नेतृत्व मे सात सदस्यीय आयोग के गठन की घोषणा की। आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे। इसीलिए सभी दलों ने इसका बहिष्कार किया। आयोग ने 1930 में अपनी रिपोर्ट पेश की तथा द्वैद्ध शासन प्रणाली,राज्य में सरकारों का विस्तार , ब्रिटिश भारत के संघ की स्थापना एवं सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखने आदि की सिफारिशें की।
आयोग के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश भारत और भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों के साथ तीन गोल मेज सम्मेलन किए । इन सम्मेलनों में हुई चर्चा के आधार पर, ‘संवैधानिक सुधारों पर एक श्वेत पत्र ' तैयार किया गया, जिसे विचार के लिए ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति के समक्ष रखा गया। इस समिति की सिफारिशों को भारत परिषद अधिनियम 1935 में शामिल कर दिया गया।
सांप्रदायिक अवॉर्ड
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रणजी मैकडोनाल्ड ने अगस्त 1932 में अल्पसंख्यकों की प्रतिनिधित्व करने की योजना की घोषणा की। इसे कम्युनल अवॉर्ड या सांप्रदायिक पंचाट के नाम से जाना गया। पंचाट ने न सिर्फ मुस्लिम , सिख, ईसाई, यूरोपियों और आंग्ल - भारतीयों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया बल्कि इससे दलितों के लिए भी विस्तारित कर दिया गया । दलितों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था से गांधी बहुत व्यधित हो गए और उन्होंने पंचाट में संशोधन के लिए पुना की यरवदा जेल में अनशन प्रारंभ कर दिया। अंततः कांग्रेस नेताओं और दलित नेताओं के बीच एक समझौता हुआ जिसे पूना समझौते (पूना पैक्ट) के नाम से जाना गया। इसमें संयुक्त हिंदू निर्वाचन व्यवस्था को बनाए रखा गया और दलितों के लिए स्थान भी आरक्षित कर दिए गए।