?वन बेल्ट वन रोड? से भारत की दूरी (part 2)

भारत की ये तीनों आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। लेकिन पर्यवेक्षक की तरह इस सम्मेलन में भाग लेने से भारत के लिए आगे का रास्ता खुला रहता। माना कि भारतीय सुरक्षा नीति विशेषज्ञों की दृष्टि में चीन से सीधा-संपर्क शायद अमेरिकी नेतृत्व को भारत से दूर कर देगा। परंतु जापान और अमेरिका ने भी इस योजना से दूरी रखते हुए भी अपने दल वहाँ भेजे। भारत की दृष्टि से अगर विचार करें, तो इस योजना में शामिल होने के कुछ दूरगामी परिणाम हो सकते थे।

विकसित होते एशियाई बाज़ार में आपूर्ति, निर्माण एवं बाज़ार तंत्र के विस्तार का यह एक अच्छा अवसर था।

चीन द्वारा प्रारंभ किए गए इस विस्तृत गलियारे के माध्यम से भारत, वियतनाम, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों से अपने आर्थिक संबंध और भी मजबूत कर सकता था।

दक्षिण एशियाई देशों के साथ मौसम की जानकारी, जलवायु शोध और आधार जैसे मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता था।

आर्थिक दृष्टि के अलावा अगर हम भौगोलिक-राजनीति की दृष्टि से इस योजना को देखें, तो भारत के इसमे शामिल हो जाने से पाकिस्तान की उलझनें निश्चित रूप से बढ़ जातीं। भारत को पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में प्रवेश करने का एक अच्छा अवसर मिल जाता। नियंत्रण रेखा पर होने वाली आए दिन की तनातनी में कुछ बदलाव आता।

चूंकि भारत एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेन्ट बैंक का सह-संस्थापक और शंघाई को ऑपरेशन बैंक का सदस्य है (जून 2017 से), इसलिए इससे वन बेल्ट वन रोड़ की कई योजनाओं को पूरा करने में सहयोग मांगा जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा सचिव ने चीन की इस योजना को वैश्विक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना है। इसलिए इस योजना से भारत का बाहर रह पाना मुश्किल है। भारत को इस योजना से जुड़ी अपनी आशंकाओं पर चीन से वार्ता करनी चाहिए, अन्य देशों को अपनी आशंकाओं से यथासंभव अवगत कराना चाहिए और एशिया में बढ़ते अपने प्रभुत्व में वृद्धि करनी चाहिए।हालांकि योजना से अलग रहते हुए प्रधानमंत्री ने उपमहाद्वीप के अपने पड़ोसी देशों, दक्षिण पूर्वी एशिया और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों में मजबूती लाने के लिए तेजी से प्रयास शुरू कर दिए हैं। इनके सकारात्मक परिणाम आने की संभावना है।
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