कनिष्क ने अपनी राजधानी पुरुषपुर में 400 फीट ऊंचा 13 मंजिलों की एक मीनार बनवाई जिसके ऊपर एक लोहां छत्र भी स्थापित किया गया तथा उसके समीप एक विशाल संघा राम निर्मित किया गया था यह संग्राम कनिष्क के चैत्य के नाम से प्रसिद्ध है इसका निर्माण यवन वास्तुकार अगिलास द्वारा किया गया|
कनिष्क के कश्मीर में कनिष्कपूर तथा तक्षशिला के सिरकप में एक नए नगर की स्थापना की थी कनिष्का सर्वाधिक विख्यात कुषाण शासक था इतिहास में दो कारणों से उसका नाम प्रसिद्ध है पहला उसने 78 ईसवी में एक संवत चलाया जो शक संवत कहलाता है( इस संवत का प्रयोग भारत सरकार द्वारा किया जाता है)|
दूसरा उसने बौद्ध धर्म का मुक्त ह्रदय से सम पोषण व संरक्षण किया कनिष्क का चीन के शासक पान चावो से युद्ध हुआ जिसमें पहले कनिष्क की पराजय हुई परंतु बाद में उसकी विजय हुई कनिष्क ने पाशो के सलाह पर बौद्धों की चौथी संगीति का आयोजन कश्मीर की कुंडल वन बिहार में कि जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र तथा उपाध्यक्ष का अश्वघोष ने की थी जिसमें बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय को अंतिम रूप दे दिया गया कनिष्क कला और संस्कृत साहित्य का भी महान संरक्षक था|
कनिष्क के राज्य सभा अनेक योग्य विद्वानों से सुशोभित थी इनमें पारशो वसुमित्र और अश्वघोष जैसे बौद्ध दार्शनिक थे नागार्जुन जैसे प्रकांड पंडित और चरक जैसे चिकित्सक कनिष्क के राज्य सभा से संबंधित थे कनिष्क का पुरोहित संघ रक्ष था|