हड़प्पा सभ्यता भारत की प्राचीनतम नगरीय सभ्यता थी ।भारत की इतिहास की प्रथम नगरीय क्रांति इसी युग में संपन्न हुई थी । इस सभ्यता का उदय ताम्र पाषाण पृष्ठभूमि में भारतीय महाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ था ।इस सभ्यता को धातु युगीन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें पत्थर के हथियारों के साथ ही साथ तांबे कांसे का भी प्रयोग शुरू किया गया था ।
इस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता या सैंधव सभ्यता कहकर इसलिए पुकारा जाता है क्योंकि इस सभ्यता से संबंधित प्रारंभिक पुरास्थल चिन्ह तथा उसकी सहायक नदियों की ईद गिर्द मिले थे। हड़प्पा मोहनजोदड़ो सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कह कर पुकारा जाता है क्योंकि इस सभ्यता से संबंधित पूरा स्थलों में सर्वप्रथम हड़प्पा की खुदाई की गई थी ।हड़प्पा वासियों ने ही सर्वप्रथम कांंसे के निर्माण की तकनीकी जानकारी प्राप्त की थी। कांस्य युगीन सभ्यता होने के बावजूद भी हड़प्पा वासियों ने अपने औजार और उपकरण के निर्माण के लिए जिस धातु का सबसे ज्यादा प्रयोग किया वह तांबा था ना कि कांंसा। हड़प्पा सभ्यता को आद्य ऐतिहासिक काल में शामिल किया गया है उल्लेखनीय है कि इस काल के लिखित और पुरातात्विक दोनों साक्ष्य मिले हैं ।हड़प्पा लिपि अभी तक अपठित होने के कारण इस काल का इतिहास लेखन मातृ पुरातात्विक साक्ष्य के आधार पर हुआ है हड़प्पा के बारे में सर्वप्रथम जानकारी 1826 में चली थी उस समय किसी का ध्यान इस ओर नहीं था इसके बाद अ1856 ईसवी में कराची से लाहौर के बीच रेलवे लाइन के निर्माण में ब्रिटिश अधिकारी एवं नियमों की जरूरत महसूस हुई और इसे प्राप्त करने के क्रम में उसे हड़प्पा स्थल के बारे में जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जिले में नदी के तट पर स्थित हड़प्पा की खुदाई की गई।अगले वर्ष सन् 1922 में राखाल दास बनर्जी ने सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने तक पर मोहनजोदड़ो का उत्खनन किया तब जाकर यह सभ्यता लोगों के सम्मुख पूर्ण रूपेण प्रकाश में आ सकी।