ओडिशा स्थित भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान में मगरमच्छों की गणना

⚫  हाल ही में ओडिशा के भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान में और केंद्रपाड़ा जिले के अन्य निकटस्थ क्षेत्रों में स्थित जलाशयों में मगरों की गणना की गई ।

⚫  गणना में मगरमच्छों की स्थिति
  
➡  हाल ही में संपन्न मगरमच्छों की गणना में इनकी संख्या 1742 पाई गई जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 1698 थी । पिछले साल , 610 शिशु , 338 छोटे मगरमच्छ , 267 किशोर , 172 उप - वयस्क और 311 वयस्क देखे गए थे ।इस गणना के दौरान चार श्वेत मगरमच्छों का भी पता चला है ।गणना से पता चला कि भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान और केंद्रपाड़ा जिले के अन्य निकटस्थ क्षेत्रों में नमकीन पानी में रहने वाले मगरों की संख्या बढ़ गयी है ।ऐसे मगरों को मुहाने वाले मगर ( Crocodylus porosus ) भी कहा जाता है ।
  
⚫  मगर मुख्यत : तीन प्रकार के होते हैं - मगर , घडियाल और नमकीन पानी में रहने वाले ।
  
➡  मगर - इन्हें प्रायः भारतीय मगरमच्छ या दलदली मगरमच्छ भी कहा जाता है ।ये पूरे |भारतीय उपमहाद्वीप में पाये जाते हैं ।  IUCN ने इन्हें संकटग्रस्त सूची में रखा है ।यह मगर मुख्य रूप से मृदुजल की प्रजाति है जो झीलों , नदियों और दलदलों में पायी जाती है ।
   
➡   घड़ियाल - यह भारतीय उपमहाद्वीप मूल की प्रजाति है । इसका मुख्य शिकार मछलियाँ हैं । IUCN की सूची में इसे गंभीर रूप से विलुप्त प्राय की श्रेणी में रखा गया है ।जिन जलाशयों में घड़ियाल पाए जाते हैं , वे हैं - राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य , कतरनिया घाट वन्य जीव अभ्यारण्य |और सोन नदी अभ्यारण्य की नदियाँ तथा ओडिशा की सतकोसिया गोर्ज आश्रयणी में महानदी का वर्षा - वन क्षेत्र । 
   
➡   नमकीन पानी में रहने वाले मगरमच्छ - ये जीव भारत के समस्त पूर्वी समुद्र तट में पाए जाते हैं ।ये सभी सरीसृपों में विशालतम होते हैं ।IUCN |के अनुसार ये उन प्रजातियों की सूची में आते हैं ।जिन पर विलुप्ति का खतरा सबसे कम है । 

⚫   भारत में मगरमच्छ संरक्षण कार्यक्रम 
   
➡ घड़ियाल और नमकीन पानी में रहने वाले मगरमच्छ के संरक्षण का कार्यक्रम - यह कार्यक्रम सबसे पहले ओडिशा द्वारा 1975 में लागू किया गया था ।इसके लिए धन और तकनीकी सहयोग भारत सरकार के माध्यम से UNDP / FAO से प्राप्त हुआ था । 

➡  दंगमाल की बाउला परियोजना - यह परियोजना भीतरकणिका अभ्यारण्य के दंगमाल में चलाई जा रही है ।विदित हो कि ओडिया भाषा में नमकीन पानी में रहने वाले सरीसृप को बाउला कहते हैं । 
  
➡  रामतीर्थ की मगर परियोजना - यह परियोजना ओडिशा के रामतीर्थ केंद्र में संचालित है और इसका कार्य मगरों का संरक्षण करना है । 

➡ घड़ियाल परियोजना - यह परियोजना ओडिशा के टीकरपाड़ा में चल रही है ।

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