राज्य विधानसभा के कार्य और शक्तियाँ

संविधान द्वारा राज्य विधान सभा को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई है। विधानसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं । विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष है। इसके अतिरिक्त जिन राज्यों में द्वितीय सदन की व्यवस्था है, उनके एक तिहाई सदस्यों का निर्वाचन विधान सभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है । राज्य की विधान सभा को सामान्यता उन सभी विषयों पर कानून निर्माण की शक्ति प्राप्त होती है,  जो राज्य -सूची और समवर्ती -सूची में दिए गए हैं । विधान परिषद विधान सभा द्वारा पारित विधायकों को केवल 4 माह के लिए रोक कर देरी ही कर सकती है ।समवर्ती सूची के विषय पर राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित हुई विधि यदि उसी विषय पर संसद द्वारा निर्मित विधि के विरुद्ध हो, तो राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि मान्य नहीं होगी कुछ विधियों को के राज्य विधान मंडल में प्रस्तावित किए जाने से पूर्व उन पर राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होती है ।ऐसे भी देखते हैं जिनका संबंध राज्य के भीतर या विभिन्न राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य व आने जाने की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से होता है वित्त विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। वित्तीय मामलों में विधान परिषद विधान सभा के अत्यधिक दुर्बल सदन विधानसभा से विनियोग विधेयक पारित होने पर ही सरकार संचित निधि से वेतन खर्च कर सकते हैं । राज्य का मंत्रिमंडल अपनी नीति और कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदाई होता है विधानसभा के सदस्य मंत्रियों से उनके विभागों के संबंध में प्रश्न पूछ सकते हैं वह " काम रोको प्रस्ताव"  ला सकते हैं विधानसभा कभी भी राज्य मंत्री परिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उसे उनके पद से हटा सकती हो हमारे संविधान में कुछ विशेष धाराएं ऐसी भी हैं जिनमें संशोधन के लिए संसद द्वारा बहुमत के आधार पर पारित प्रस्ताव को भी कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा शिव कार्य किया जाना आवश्यक होता है। इस प्रकार राज्य विधानसभा संविधान संशोधन के कार्य में भी भाग लेती है विधान सभा की शक्तियां निम्नलिखित हैं।

1- वैधानिक शक्ति

2- कार्यपालिका की शक्ति

3- वित्तीय शक्ति

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