जीव विज्ञान - जीवधारियों का वर्गीकरण : वर्गिकि तथा जातिवृत

वर्गिकि तथा जातिवृत (Taxonomy and Phylogeny)

वर्तमान में सभी वैज्ञानिक जैव विकास की धारणा में विश्वास रखते हैं। कालान्तर में जैसे-जैसे वातावरण एवं परिस्थियों में परिवर्तन हुए, वैसे-वैसे इन प्राथमिक जीवों में भी परिवर्तन होते रहे जिसके फलस्वरुप बहुकोशिकीय जातियों का उद्भव हुआ। तत्पश्चात बदलती परिस्थितियों के अनुसार पहले सरल स्थलीय तथा बाद में जटिल स्थलीय जातियों की उत्पत्ति हुई। जो जातियां बदली परिस्थितियों के अनुसार अपने को अनुकूलित न कर पाईं, वे विलुप्त हो गईं। जीवधारीयों में धीरे-धीरे परंतु सतत चलने वाली इस प्रक्रिया को जैव विकास कहा जाता है। किसी भी जाति के विकासात्मक इतिहास को उस जाति का जातिवृत्त कहते है।

             जीवधारियों के वर्गीकरण की आदर्श पध्दति वही होगी जो कि उनके जातिवृत्तीय सम्बन्धों को प्रदर्शित करे। वर्गीकरण की ऐसी पध्दति को विकासीय वर्गीकरण अथवा जातिवृत्तीय वर्गीकरण कहते हैं। परन्तु जीवधारियों के विषय में हमारा ज्ञान अभी बहुत अधूरा है। अनेकों जीवाश्म अभिलेख जिनसे सम्भवतः आज के जीवधारियों की उत्पत्ति हुई, हमें उपलब्ध नहीं है। अतएव एक आदर्श जातिवृत्तीय वर्गीकरण के प्रतिपादन की फिलहाल कोई सम्भावना नहीं है। फिर भी जीव वैज्ञानिक समय-समय पर उपलब्ध ज्ञान के आधार पर वर्गीकरण की पध्दतियां प्रस्तुत करते रहते हैं। जैसे-जैसे वर्तमान एवं निवर्तमान जीवधारियों से सम्बन्धित ज्ञान में वृध्दि होती रहती है, वर्गीकरण की पध्दतियों में भी उपयुक्त परिवर्तन कर दिए जाते हैं।

शेष आगे भी वर्गीकरण पे चर्चा करते है ....

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