कनिष्क प्रथम
कुषाण वंश का सबसे महान शासक कनिष्क था। संभवत उसका राज्याभिषेक 78 ईसवी में हुआ था। कनिष्क ने अपनी दो राजधानियां बनाई - पेशावर और मथुरा । इसमें से उसकी मुख्य राजधानी पेशावर (पुरुषपुर) ही थी। वह एक साम्राज्यवादी शासक था। चीन के साथ उसके दो युद्ध भी हुए पहले में पराजित होने के उपरांत दूसरे में उसे विजय प्राप्त हुई। चीन के साथ हुए इन युद्धों के दौरान चीनी सेनापति पानचाओ था। कनिष्क ने तो मध्य एशिया के क्षेत्र से गुजरने वाले प्रसिद्ध रेशम मार्ग पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था बौद्ध धर्म को दिए गए उसके महत्वपूर्ण योगदान के कारण उसे दूसरा अशोक कहकर पुकारा गया । इसी के काल में कश्मीर के कुंडल वन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र के द्वारा संपन्न हुई। इस संगीत में यह धर्म हीनयान और महायान जैसे दो शाखाओं में विभाजित हो गया कनिष्क इसमें से महायान धर्म को मानने वाला था।
कनिष्क विद्वानों का भी महान संरक्षक शासक था। उसके दरबार में अश्वघोष वसुमित्र नागार्जुन चरक पार्श्व जैसे विद्वान निवास करते थे पार्श्व नामक विद्वान के कहने पर ही कनिष्क ने चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया था ।
अश्वघोष को भारत का मिल्टन भी कहा जाता है इन्होंने बुद्धचरित सौंदरानंद सारिपुत्रप्रकरण जैसे पुस्तकों की रचना की ।सारिपुत्रप्रकरण को संस्कृत भाषा में लिखा जाने वाला प्रथम नाटक ग्रंथ माना जाता है इसलिए अश्वघोष को ' संस्कृत ड्रामा का पिता' कहकर भी पुकारा जाता है।
चरक कनिष्क के दरबार में रहने वाले एक प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री थे जिन्होंने चरक संहिता नामक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ की रचना की। नागार्जुन को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है जिन्होंने शून्यवाद का प्रतिपादन किया ।
कनिष्क ने 78 ईसवी में एक नया संवत "शक संवत" चलाया।
मेघनाथ साहा समिति के द्वारा अनुशंसित किए जाने के पश्चात 22 मार्च 1957 ईस्वी को शक संवत को राष्ट्रीय संवत् के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इस संवत का पहला महीना चैत्र कहलाता है जो 21 या 22 मार्च को प्रारंभ होता है।