भारत शासन अधिनियम 1935 के पहले दो भाग पढ़ने के लिए 8 फरवरी 2019 का नोट देखें।
पार्ट 3
• प्रान्तीय स्वयत्तता - ‘ प्रान्तों में स्वायत्त शासन की स्थापना ' इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी । * विधि निर्माण हेतु वर्गीकृत केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों में से प्रान्तीय विषयों पर विधि बनाने का अत्यान्तिक अधिकार प्रान्तों को दिया गया तथा उन पर से केन्द्र का नियंत्रण समाप्त कर दिया गया । अब प्रान्तों के गवर्नर ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते थे , न कि गवर्नर जनरल के अधीन ।
• संघीय न्यायालय ( Federal Court ) की स्थापना- यह दिल्ली में स्थित था । इसमें मुख्य न्यायाधीश तथा अधितम 7 अन्य न्यायाधीश हो सकते थे । उनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी । उसके निर्णय के विरुद्ध अपील प्रिवी कौसिल ( Privv council ) में की जा सकती थी । 1 अक्टूबर 1937 से यह न्यायालय कार्यरत हो गया । इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मौरिस ग्वेयर थे ।
• शक्तियों का विभाजन - 1935 के अधिनियम द्वारा केन्द्र एवं प्रान्तों के मध्य शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों में यथा - ( i ) संघ सूची ( 59 - विषय ) | ( ii ) प्रान्तीय सूची ( 54 विषय ) तथा ( iii ) समवर्ती सूची ( 36 विषय ) में किया गया था । अवशिष्ट विषयों सहित कुछ आपातकालीन अधिकार वायसराय को सौंपा गया था ।
• 11 प्रान्तों में विधान सभा का गठन किया गया । 6 प्रान्तों में द्विसदनीय विधान मण्डल की । स्थापना की गयी । उच्च सदन , विधान परिषद एक स्थाई सदन था । निम्न सदन विधान सभा थी।
• इस अधिनियम द्वारा भारत परिषद का अन्त कर दिया गया ।
• 1937 का विधान सभा चुनाव इस अधिनियम के लागू होने के परिणाम स्वरूप हुआ ।
• इस अधिनियम द्वारा 1935 ई . में बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया ।