कांचीपुरम के पल्लव वंश का इतिहास

पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575-600 ईस्वी) था। जिस के दरबार में भारवि नामक एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान निवास करते थे। जिन्होंने किरातार्जुनीयम नामक ग्रंथ की रचना की। पल्लव वंश का प्रथम महान शासक महेंद्र वर्मन प्रथम (600-630 ईसवी) था। उसी के काल में पल्लव चालुक्य संघर्ष की शुरुआत हुई थी। बादामी के चालुक्य वंश के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव राजा पर हमला कर दिया जिसमे महेंद्र वर्मन पराजित हुआ। महेंद्र वर्मन प्रथम प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयाई था ।बाद में शैव नयनार संत अप्पार के प्रभाव में आकर शैव धर्म अपना लिया। इसके शासनकाल में तमिल साहित्य का पर्याप्त विकास हुआ ।नयनार संत अप्पार एवं संबन्दर के द्वारा तेवारम की रचना इसी के काल में हुई थी। महेंद्र वर्मन ने स्वयं मतविलास प्रहसन और भागवदजुक नामक प्रसिद्ध नाटक की रचना की । उनके शासनकाल में ही 640 इसी में चीनी यात्री हेनसांग में कांचीपुरम की यात्रा की। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने ही कांची का कैलाश मंदिर और महाबलीपुरम के तटीय शोरमंदिर का निर्माण करवाया था। नंदी वर्मन ने कांची के बैकुंठ पेरूमल मंदिर का निर्माण करवाया था। पल्लव काल में ही मंदिर निर्माण की द्राविड़कला शैली का विकास हुआ ।इसके अंतर्गत कुल 4 शैलियां अस्तित्व में आई- महेंद्र वर्मन प्रथम, नरसिंह वर्मन प्रथम, नरसिंह वर्मन द्वितीय, राज सिंह शैली, नंदी वर्मन शैली। महेंद्र वर्मन शैली को मंडप शैली भी कहा जाता है जबकि नरसिंह वर्मन प्रथम शैली को शैली को मामल्ल या महामल्ल शैली भी कहा जाता है। नरसिंह वर्मन प्रथम ने मामल्ल की उपाधि धारण की ।उसने महाबलीपुरम या मामल्लपुरम नामक एक नए शहर की स्थापना कि यहां पर इसने मंडप और रथ का निर्माण कराया ।
इन रथों को सप्त पैगोडा कहकर भी पुकारा जाता है क्योंकि इन रथ मंदिरों की संख्या सात है। रथ मंदिरों में द्रौपदी रथ सबसे छोटा और धर्मराज रथ सबसे प्रसिद्ध है। पल्लवों के शासनकाल में इतिहास के मंदिरों में देवदासी प्रथा काफी लोकप्रिय हुई इन्ही के काल में ही दक्षिण भारत में शैव नएनार और वैष्णोअलवार संतो का आगमन हुआ था ।
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