जीवधारियों की द्वि-जगत वर्गीकरण प्रणाली :
अरस्तू द्वारा समस्त जीवों को दो मुख्य समूहों – जन्तुओं एवं वनस्पतियों – में विभाजित करने की परम्परा का शताब्दियों तक पालन किया गया। लिनियस ने भी अपनी पुस्तक ‘Systema Naturae’ में सम्पूर्ण जीवधारियों को दो जगतों –पादप जगत तथा जन्तु जगत – में विभाजित किया। पौधों (जैसे कि आम का पेड़, गुलाब, गेहूं) तथा जन्तुओं (जैसे कि मछली, सर्प, बन्दर) के बीच अन्तर इतने स्पष्ट हैं कि किसी जीव वैज्ञानिक ने काफी समय तक इस द्वि-जगत प्रणाली में किसी परिवर्तन की कोई आवश्यकता अनुभव नहीं की।
जन्तु जगत में उन जीवधारियों को सम्मिलित किया जाता रहा जिनमें सेलुलोस-युक्त कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है, जो प्रचलन में समर्थ परन्तुअपने भोजंके निर्माण में असमर्थ जोते हैं। इसके विपरीत क्लोरोफिल युक्त, अपने भोजन के संश्लेषण में समर्थ, परंतु प्रचलन में असमर्थ जीव जिनमें सेलुलोस-युक्त कोशिका भित्ति विद्यमान होती है, पादप जगत में सम्मिलित किए जाते रहे।
द्वि- जगत वर्गीकरण की कमियां – कालान्तर में द्वि-जगत वर्गीकरण प्रणाली में धीरे-धीरे अनेक कमियां दृष्टिगोचर होने लगीं। उदाहरणतया, कवक जो कि पौधों की भांति अचल तथा फैले हुए तो होते हैं, परन्तु उनमें प्रकाश-संश्लेषण की शक्ति नहीं होती, जैसा कि जन्तुओं में भी नहीं होती। कुछ शैवाल जो कि प्रकाश-संश्लेषण कर सकते हैं, वे या तो स्वयं चल सकते हैं अथवा चल (motion) जनन कोशिकाएं उत्पन्न करते हैं। कुछ जीवधारी जैसे क्लेमाइडोमोनास, यूग्लीना तथा अवपंक कवक जन्तु वैज्ञानिकों द्वारा जन्तु जगत में तथा वनस्पतिशास्त्रियों द्वारा वनस्पति जगत में सम्मिलित किए जाते रहे हैं। इस प्रकार, अनेकों जीव ऐसे हैं जो कि जन्तुओं एवं पादपों, दोनों के मिश्रित लक्षण प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के जीवधारी न तो स्पष्टतः जन्तु कहे जा सकते हैं, न स्पष्टतः पौधे। इस प्रकार के जीवधारियों को समायोजित करने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा एक तीसरे जगत की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया।
शेष अगले नोट्स में इसी विषय पर चर्चा करेंगे...