भारत की विदेश -नीति शान्ति और अहिंसा की विदेश नीति रही है। फलता भारत निशस्त्रीकरण का प्रबल समर्थक रहा है। निशस्त्रीकरण के संबंध में यह मान्यता रही है कि युद्धों का एक प्रमुख कारण शस्त्रों का अस्तित्व है। अतः निशस्त्रीकरण ही अंतरराष्ट्रीय शांति को सुदृढ़ बना सकता है, यह शास्त्रों के उत्पादन पर होने वाले बेहिसाब खर्चों से छुटकारा दिला सकता है। इसके द्वारा बचाए गए साधनों तथा धन का प्रयोग सभी राष्ट्रों के विकास के लिए किया जा सकता है। इसीलिए भारत की विदेश नीति हथियारों विशेषकर परमाणु हथियारों के निशस्त्रीकरण की प्रबल समर्थक रही है । अपनी इस मान्यता के कारण भारत और उसके अन्य सहयोगी देशों ने सन 1961 में आणविक परीक्षण को बंद करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में रखा।
* 1962 मैं जेनेवा के निशस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने अपने साथ अन्य सहयोगी देशों के सहयोग से सम्मेलन में एक स्मरण पत्र प्रस्तुत किया। 1988 ई० मैं निशस्त्रीकरण के लिए आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के तीसरे सत्र में भारत ने एक कार्य योजना परमाणु शस्त्र मुक्त और अहिंसक विश्व व्यवस्था प्रस्तुत की थी ।
*भारत परमाणु अप्रसार संधि और व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि का उसकी भेदभाव पूर्ण नीति के कारण दृढ़ता से विरोध करता रहा है, भारत ने अपनी परमाणु कार्यक्रम को शांतिपर्ण उद्देश्य और न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने तक सीमित रखा है। भारत के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए अमेरिका ने भारत के साथ सन 2008 में परमाणु ऊर्जा से संबंधित एक समझौता किया, इसका समर्थन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG ) के 45 देशों में भी किया भारत अपने प्रमाण विकल्प को तब तक छोड़ने पर सहमत नहीं है । जब तक अन्य परमाणु शस्त्र संपन्न राष्ट्र इसके लिए तैयार नहीं हो जाते।