देश भर के 256 जिलों में अभी भी लोगों को फाइलेरिया ( हाथी पाँव ) की बीमारी का खतरा बना हुआ है ।इस बीमारी को पूरी तरह से खत्म करने के लिए भारत अब तीन दवाओं के इस्तेमाल की नीति अपनाएगा ।इस बीमारी के उन्मूलन के लिए 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य नीति बनाई गई थी , लेकिन समय पर परिणाम न मिलने ।की वजह से इसे 2017 तक बढ़ा दिया गया ।फाइलेरिया से देश के 256 जिलों में लगभग 65 करोड़ भारतीयों को खतरा है ।विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक , दुनिया भर में ।पाए जाने वाले फाइलेरिया के 40 फीसदी मरीज भारत में हैं ।
क्या है लिम्फटिक फाइलेरिया फाइलेरिया रोग में हाथ या पैर बहुत अधिक सूज जाते हैं ।इसलिए इस रोग को हाथी पाँव भी कहते हैं ।हालाँकि इस रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते ।यह बीमारी पूर्वी भारत , मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में ज्यादा फैली हुई है ।संक्रमित मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं ।ये कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और |उन्हें बंद कर देते हैं ।
फाइलेरिया के लक्षण
फाइलेरिया के बाद सूजन की बीमारी अलग - अलग समय के अंतराल पर होती है ।
यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि कुछ लोगों में यह बीमारी पूरी जिंदगी सामने नहीं आती ।
अकसर पैरों और हाथों की लसिका वाहिकाएँ लाल हो जाती हैं और उनमें दर्द भी होता है ।इस स्थिति में लसिका नलियों के बंद होने से लसिका के इकट हो जाने के कारण सूजन हो जाती है ।
ट्रिपल ड्रग थेरेपी
लिम्फटिक फाइलेरिया का इलाज नहीं है , लेकिन दवाओं के जरिये इसकी रोकथाम की जा सकती है ।इस बीमारी के उन्मूलन के लिए पहले 2 दवाओं की नीति अपनायी जाती थी ।इसके तहत ऐसे इलाकों में जहाँ फाइलेरिया के संक्रमण |की संभावना अधिक है , वहाँ इसकी रोकथाम |के लिए दो दवाएँ डाईइथाइल - कार्बामाजीन ( डीईसी ) और एलबेंडाजोल दी जाती थीं ।अब इन दोनों दवाओं के साथ एक और दवा शामिल की गई है ।यह दवा है आइवरमेकटिन ।इन तीनों दवाओं को देश के संक्रमण प्रभावित इलाकों में लोगों को मुफ्त में देने का अभियान चलाया ।जाएगा ।दो दवा नीति के तहत इन इलाकों में पाँच साल तक ये दोनों दवाएँ दी जाती हैं , जबकि नई दवा नीति अपनाने पर इन इलाकों में सिर्फ दो साल तक दवाएँ देनी होंगी ।