मनसबदारी व्यवस्था

अकबर द्वारा स्थापित प्रशासन तंत्र और राजस्व व्यवस्था को जहांगीर और शाहजहां ने मामूली परिवर्तन के साथ जारी रखा परंतु मनसबदारी व्यवस्था की कार्य पद्धति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। अकबर के अधीन अपनी सैनिक टुकड़ी के खर्च के लिए मनसबदार ओं को औसतन ₹240 प्रति वर्ष प्रति सवार दिए जाते थे। बाद में जहांगीर के शासनकाल में उसे घटाकर ₹200 कर दिया गया सवारों को यह उनकी राष्ट्रीयता और घोड़े के स्तर के अनुसार अदायगी की जाती थी ।
जहाँगीर ने एक प्रणाली प्रारंभ की जिसके अनुसार सरदारों को जात दर्ज में कोई वृद्धि किए बिना अधिक सवार रखने की इजाजत दी जा सकती थी इस प्रणाली को दोअस्पा व सिंह अस्पा कहते थे। शाहजहां के शासनकाल में एक और भी परिवर्तन देखने को मिलता है जिसका उद्देश्य किसी सरदार द्वारा रखे जाने वाले सवालों की अपेक्षित संख्या अधिक कमी देना था। इस प्रकार सरदार से अपने सवार दर्जे के सिर्फ एक तिहाई सवार तथा कुछ मामलों में तो सिर्फ सवार की अपेक्षा की जाती थी ।
मनसबदारों के वेतन रुपयों में निर्दिष्ट होते थे परंतु उन्हें सामान्य रूप से नकद भुगतान नहीं किया जाता था बल्कि इसके एवज में उन्हें जागीरे दी जाती थी।
 जागीरो के आवंटन के लिए राजस्व विभाग को एक बही रखनी पड़ती थी जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की वसूली गई आमदनी दर्ज होती थी परंतु लेखा रुपयों में नहीं बल्कि दामों में दिखाया जाता था। इस दस्तावेज को जमा-दामी कहा जाता था ।
 मनसबदारों की अत्यधिक संख्या और कई दूसरे कारणों से राज्य के वित्तीय संसाधनों पर बहुत दबाव पड़ रहा है ।
एक नई युक्ति अपनाकर सरदारों द्वारा अपने सवार दर्जे के अनुसार रखे जाने वाले सवारों और घोड़ों की संख्या में और भी कमी कर दी गई ।
मुगलों की मनसबदारी प्रणाली काफी जटिल थी उसका कुशलता से कार्य करना कई बातों पर निर्भर था इसमें दाग प्रणाली व जागीरदारी प्रथा का उचित अमल आचरण भी शामिल था।
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