संगम कालीन चेर राजवंश का इतिहास

चेर राजवंश या केरलपुत्त की गतिविधियों का मुख्य केंद्र केरल का मालाबार क्षेत्र था । उसका प्रतीक चिन्ह धनुष था। इसकी राजधानी वांचि या करूर थी जबकि तटीय राजधानी मुजिरिस या मुशिरी थी।ये दोनों स्थान केरल में स्थित है। चेर वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक उदयनजेरल था।उसके पास एक विशाल पाकशाला थी इसलिए उसने कुरुक्षेत्र में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया था।
उदयनजेरल के बाद उसका पुत्र नेदुनजेरल आदन शासक बना। वह चोल शासक करिकाल के समकालीन था। इसने कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक के प्रदेश को अपने साम्राज्य में मिला लिया । इन्हीं विजयों के उपलक्ष्य में इसने इमयवरंबन की उपाधि धारण की थी । इस उपाधि का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसने अपना राजकीय चिन्ह हिमालय पर्वत पर उत्कीर्ण कराया हो। चेर राजवंश का सबसे प्रसिद्ध शासक सेनगुट्टवन था जिसका तात्पर्य होता है न्यायपरायण ।
इसकी महानता के चर्चे संगमकालीन कवियों में अग्रणी परणर ने भी की थी।
शेनगुट्टवन को लालचेर के नाम से भी पुकारा जाता है । वह विद्या व धर्म का उदारवादी संरक्षक था। उसने दक्षिण भारत में पत्नी पूजा या कण्णगी पूजा की परंपरा शुरू की।
सेनगुट्टुवन दक्षिण भारत से चीन में अपना दूत भेजने के लिए भी जाना जाता है ।चेर वंश का अंतिम शासक शेय था। जिसे हाथियों की आंख वाला कहकर पुकारा जाता है।
चेर बंदरगाह नगर मुजिरिस या मुसीरी केरल भारत रोम व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था ।रोमन लोगों ने सेना की दो छावनियां यहाँ स्थापित की थी ।
यवनों ने मुजिरिस में अपने शासक आगस्टस की एक मूर्ति भी बनवाई थी।
Posted on by