वाष्पन

अपने क्वथनांक से नीचे ही किसी द्रव के वाष्प में प्रवर्तित होने का प्रक्रम वाष्पन कहलाता है । किसी द्रव के वाष्पन कमरे के ताप पर भी हो सकता है, गीले कपड़े उनमें उपस्थित जल के वाष्पन के कारण ही सूख जाते हैं ।पोखकरो का जल भी वाष्पन के कारण ही सूख जाता है।

* द्रव का ताप बढ़ाने पर वाष्पन की दर में वृद्धि होती है। किसी द्रव के वाष्पन की दर उसके क्वथनांक पर अधिकतम होती है।

* वायु की आद्रता जब निम्न होती है, तो वाष्पन की दर ऊंची होती है, और जल अत्यंत शीघ्र वाष्पित होता है ।जबकि  वायु की आद्रता ऊंचे होने पर वाष्पन की दर धीमी हो जाती है। 

*वाष्पन के कारण शीतलन- किसी पात्र मेंं भरा द्रव जब वस्तुत होता है तो वह उस पात्र से वाष्पन की गुप्त ऊष्मा प्राप्त करता है। ऊष्मा प्राप्त होने के कारण वह पात्र ठंडा हो जाता है।

* वाष्पन के कारण शीतलन का एक अच्छा उदाहरण मिट्टी के बर्तनों में जल का ठंडा होना है मिट्टी के घड़ों की दीवारों में बड़ी संख्या में अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं ।कुछ जल लगातार इन छिद्रों से घड़ों के बाहर  रिस कर वाष्पित होता रहता है,  वाष्पन के लिए आवश्यक गुप्त ऊष्मा मिट्टी के बरतन तथा शेष जल से प्राप्त होती है। इस प्रकार घड़ों में शेष जल ऊष्माखो देता है और ठंडा हो जाता है।

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