इस्लाम शब्द का तात्पर्य होता है पवित्रता या विनम्रता या शांति में प्रवेश करना। इसका एक अन्य अर्थ शांति में प्रवेश करना भी होता है ।अतः इस्लाम धर्म एक ऐसा धर्म है जो परमात्मा वह मनुष्य के साथ पूर्ण शांति का संबंध रखता है। इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग मुसलमान कहलाते हैं यह शब्द दो शब्दों के मेल से बना है एक मुसल्लम और दूसरा ईमान यानी जिसका ईमान पुख्ता हो ।
प्रत्येक मुसलमान का यह फर्ज बनता है कि वह अल्लाह को एक ही ईश्वर एवं मोहम्मद साहब को उनका पैगंबर माने।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक मुसलमान के लिए पांच पवित्र कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है-
कलमा
रोजा
नमाज
हज
जकात
इस्लाम धर्म का संस्थापक मोहम्मद साहब को माना जाता है । मोहम्मद साहब का जन्म 570 ईसवी में मक्का में कुरैशी कबीले के हाशमी वंश के एक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला माता का नाम अमीना तथा उनकी पत्नी का नाम खदीजा व पुत्री का नाम फातिमा था ।फातिमा के ही पति का नाम अली था जो बाद में चौथे खलीफा बने ।
मोहम्मद साहब को 610 ईसवी में मक्का के निकट हीरा नामक पहाड़ी पर जिब्राइल के माध्यम से अल्लाह का एक संदेश मिला। वह संदेश था- अल्लाह ही एकमात्र ईश्वर है उसके सिवा कोई दूसरा नहीं है और मोहम्मद साहब उनके पैगंबर या संदेश वाहक हैं ।
ज्ञान की प्राप्ति के बाद मोहम्मद साहब नबी कहलाए ।
नबी कहते हैं- किसी उपयोगी परम ज्ञान की घोषणा को । मोहम्मद साहब ने ऐसी घोषणा की इसलिए वे नबी कहलाए। तब से नबी का अर्थ वह दूत भी हो गया है जो परमेश्वर व समझदार प्राणी के बीच आता जाता है।
उन्हें अल्लाह का यह भी संदेश मिला कि जाओ अल्लाह के बंदों को राह दिखाओ। इसके बाद मोहम्मद साहब अपने क्षेत्र में वापस आए और अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया ।
एकेश्वरवाद के प्रचार-प्रसार के कारण बहू देव और तथा मूर्ति पूजा के समर्थक कट्टरपंथियों ने उनके ऊपर जानलेवा हमले कर दिए ।
अपने प्रतिकूल परिस्थितियों जानकर मोहम्मद साहब 622 ईसवी में मक्का छोड़कर मदीना चले गए ।इस घटना के उपलक्ष्य में मुसलमानों के सबसे पवित्र सम्मत हिजरी संवत की शुरुआत हुई। यह संवत् दूसरे खलीफा उमर की आज्ञा से प्रारंभ हुआ था ।
हिजरत अरबी भाषा के शब्द से निकला है जिसका तात्पर्य होता है -जुदाई या वियोग ।
इसका एक अन्य अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना ।मदीना में जिन लोगों ने उनकी मदद की उन्हें अंसार या मददगार पुकारा गया और मोहम्मद साहब तथा उनके साथ जो लोग वहां पहुंचे तो उन्हें मुहाजिर कह कर पुकारा गया। धीरे-धीरे मदीना में उनकी स्थिति काफी अच्छी हो गई कुछ समय के बाद एक बार फिर से वापस लौटे ।इस बार क्षेत्र को अपने विचारों से प्रभावित करने में सफल हो गए ।
632 ईस्वी में जब उनकी मृत्यु हुई उस समय तक करीब पूरा अरब क्षेत्र इस्लाम धर्म से आप्लावित हो चुका था।