शिया सुन्नी में धर्म का विभाजन

मोहम्मद साहब ने अपनी मृत्यु के पूर्व अपने उत्तराधिकारी के बारे में अपनी कोई स्पष्ट राय नहीं रखी थी। इसलिए उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया ।
अंसारी यों का कहना था कि मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी उनके परिवार के किसी सदस्य को नहीं बल्कि एक योग्य निर्वाचक मंडल के द्वारा सर्वसम्मति से चुने गए किसी व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए इस विचार के पक्ष पोषक लोग ही सुन्नी कहलाए।
मुजाहिरों का यह मानना था कि मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी उनके परिवार के किसी सदस्य को ही बनाया जाना चाहिए और यह लोग मोहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद अली को इस्लाम धर्म के मुखिया बनाए जाने के पक्ष में थे इस विचार के पोषक लोग ही शिया कहलाए। इस प्रकार इस विवाद के परिणाम स्वरुप इस्लाम धर्म सिया और सुन्नी जैसे दो शाखाओं में विभक्त हो गया ।
आरंभ में विजय सुन्नियों की हुई और उनके समर्थक 3 साधक को खलीफा बनाया गया पहला अबुबक्र ( 632- 634 ईस्वी), दूसरा उमर (634- 644 ईस्वी), तीसरा उस्मान (644-656ई)। 
इसके बाद समर्थक अली(656-661ई) को खलीफा बनाया गया ।इन चारों को रसीदुन खलीफा या पवित्र खलीफा कहा जाता है।

इस्लाम धर्म के मूल सिद्धांत कुरान और हदीस में मिलते हैं।मोहम्मद साहब को जिब्राइल नामक दूत के माध्यम से अल्लाह से प्राप्त होने वाले संदेशों का संकलन कुरान के नाम से जाना गया ।

हदीस उस ग्रंथ को कहा गया जिसमें मोहम्मद साहब के द्वारा आम जनों को दिए जाने वाले उपदेशों का संकलन है।

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