भारत पर पारसी या ईरानी आक्रमण

 
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में एक ओर जहां गंगा के मध्यवर्ती इलाके में मगध साम्राज्य की नींव रखी जा रही थी वहीं दूसरी और भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में ईसाइयों का आक्रमण हो रहा था ।
भारत पर विदेशी आक्रमण ईरान की हखामनी वंश के राजाओं ने ही किया था। इस वंश का संस्थापक कुरुष था। इस समय की यूनानी लेखक हेरोडोटस, एरियन एवं स्ट्राबो के अनुसार उसने भारत पर आक्रमण करने की असफल कोशिश की ।कुरूष उत्तर अधिकारियों में प्रमुख डेरियस प्रथम या दारावयहू था। जिसे भारत पर आक्रमण करने में प्रथम सफलता मिली थी ।डेरियस प्रथम ने ही सर्वप्रथम गांधार को जीतकर फारसी साम्राज्य में मिला लिया था । 
डेरियस प्रथम के इस अभियान की सफलता का उल्लेख बेहिस्तून  पार्सिपोलिस अभिलेखों में मिलता है। इतिहास के पिता हेरोडोटस इस.विजित भारतीय भूभाग को फारसी साम्राज्य का 20 वां प्रांत कहता है। डेरियस प्रथम के पश्चात खसयार्स ने जीते गए भारतीय प्रदेश पर अधिकार बनाए रखा। इसके परिणाम स्वरुप भारत में प्रांतीय शासन का सूत्रपात हुआ ।
प्रांतों को छत्रपी तथा उस पर शासन करने वाले को छत्रप कहा गया।इस क्षत्रप प्रणाली का प्रयोग बाद में कषाणों तथा शकों ने किया। 
पारसी राजाओं ने महाराजाधिराज, परमदैवत व परमभागवत जैसी उपाधियां ग्रहण की। मौर्य काल में दंड के रूप में सर घुटवाने की प्रथा, स्त्री शरीर रक्षकों की नियुक्ति, मंत्रियों के कक्ष में हर समय अग्नि के प्रज्वलित रहने आदि की व्यवस्था पारसीयों से ही ग्रहण की गई थी। फारस के संपर्क से भारत में अरामेईक लिपि का विकास हुआ। इसी से बाद में खरोष्ठी लिपि निकली।
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