भारत में राज्यों के पुनर्गठन की मांग सबसे पहले 1928 ई. में नेहरू रिपोर्ट में कही गई। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात 1948 में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश S.K. दर की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्यों के पुनर्गठन का आधार भाषा के बजाय प्रशासनिक व्यवस्था होना चाहिए। इसकी रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए 1949 में जेवीपी समिति (जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पट्टाब सीता मैया समिति) का गठन किया गया। जिसने अपनी रिपोर्ट में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को खारिज कर दिया।
इसी समय में दक्षिण भारत में तेलुगू भाषा क्षेत्र के नेताश्री पोट्टी श्रीरामल्लू कि 56 दिनों के आमरण अनशन के बाद उनकी मृत्यु हो जाती है। जिसके बाद 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र प्रदेश (राजधानी करमूल) का गठन कर दिया जाता है। इसके बाद दिसंबर 1953 में राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में फजल अली आयोग (दो अन्य सदस्यों केएम परिकर और हृदयनाथ पुंजरु) का गठन किया जाता है। जिस ने 1915 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इन्होंने अपने से बारिश में कहा कि राज्यों के पुनर्गठन भाषा के साथ साथ प्रशासनिक सुविधा, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की बात ध्यान में रखनी चाहिए। इस आयोग ने 16 राज्य व 3 संघ शासित प्रदेशों की सिफारिश की थी।
NOTE-
1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया जिसमें 14 राज्य व 6 संघ शासित प्रदेशों के गठन का प्रावधान किया गया।