मूल अधिकार

    मूल अधिकार व अधिकार होते हैं जो प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों को प्रदान करता है ताकि अपना सर्वांगीण विकास कर सके। दूसरे शब्दों में मूल अधिकार राज्य के प्रत्येक नागरिक के दावे होते हैं।

 मूल अधिकार व मानवाधिकार में अंतर-

     मूल अधिकार व मानवाधिकार में अंतर यह है कि मूल अधिकार अपने राज्य के नागरिकों को प्राप्त होते हैं जबकि मानवाधिकार मानव होने के नाते प्रत्येक जगह का प्रत्येक राज्य में स्वता प्राप्त होते हैं।

    मूल अधिकारों का सर्वप्रथम उल्लेख इंग्लैंड के सम्राट जान द्वितीय द्वारा जारी मैग्नाकार्टा में दिखाई देता है जबकि अमेरिका वह पहला देश था जिसने अपने संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान किया।

    भारत में मूल अधिकारों के संबंध में एक अस्पष्ट दृष्टिकोण नेहरू जी की रिपोर्ट में दिखाई दे पड़ता है।

     पुनः कराची अधिवेशन मार्च 1931 में सरदार वल्लभभाई पटेल जी की अध्यक्षता में आयोजित किया जाता है जहां पर मौलिक अधिकार व कर्तव्य शीर्षक का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था। पुनः स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 12 से 35  तक मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया जिसमें भारतीय नागरिकों को सात मौलिक अधिकार दिए गए थे।

     लेकिन 44 में संविधान संशोधन 1978 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है और अब यह अनुच्छेद 300 (क) के अंतर्गत एक विधिक अधिकार है।

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