स्वराज्य पार्टी ( भाग 3 )

स्वराज्य पार्टी की स्थापना

दोनों पक्षों के मध्य समझौता :-

इसके तहत स्वराजियों को कांग्रेस के एक समूह के रूप में चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी गयी। स्वराजियों ने भी केवल एक शर्त को छोड़कर कि वे विधान परिषदों में भाग नहीं लेंगे, कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों को स्वीकार कर लिया। नवम्बर 1923 में नवगठित केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा तथा विधान परिषदों के लिये चुनाव आयोजित किये गये।

स्वराजियों का चुनाव घोषणा-पत्र:-


अक्टूबर 1923 में घोषित अपने चुनाव घोषणापत्र में स्वराजियों ने साम्राज्यवाद के विरोध को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया। इस घोषणा-पत्र की महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार थीं-
भारत पर अंग्रेजी हुकूमत का मुख्य लक्ष्य, इंग्लैंड के स्वार्थी हितों की पूर्ति करना है।
साम्राज्यवादी शासन के तथाकथित सुधारवादी कानून, विदेशी हुकूमत के शोषण को बल प्रदान करते हैं। अंग्रेजों की वास्तविक मंशा, भारत के असीमित संसाधनों का अन्यायपूर्ण दोहन तथा भारतीय जनता को गुलाम बनाकर रखना है।
स्वराजी, स्वशासन की राष्ट्रवादियों की मांग को परिषदों में उठायेंगे।
यदि सरकार ने उनकी मांगे नामंजूर कर दी तो वे संयुक्त प्रयासों द्वारा परिषदों की कार्य संचालन की प्रक्रिया को अवरुद्ध कर देंगे।
इस प्रकार वे विधान परिषदों को सरकार की दुर्भावना को उजागर करने हेतु एक उपयुक्त मंच के रूप में प्रयुक्त करेंगे तथा उसका उपयोग भारतीयों के हित में करेंगे।

गांधीजी की प्रतिक्रिया :-

प्रारम्भ में गांधीजी विधान परिषदों का सदस्य बनने तथा उसकी कार्यवाही में बाधा पहुंचाने की नीति के विरोधी थे। किन्तु फरवरी 1924 में स्वास्थ्य की खराबी के आधार पर जेल से रिहाई के पश्चात् धीरे-धीरे उन्होंने स्वराजियों के साथ एकता स्थापित करनी शुरू कर दी।

इसके तीन प्रमुख कारण थे-

उन्होंने महूसस किया कि विधान परिषदों में हिस्सेदारी प्रारम्भ हो जाने के पश्चात् इससे पीछे हटना या इसका विरोध करना गलत होगा क्योंकि इससे सरकार तथा जनता दोनों के मध्य गलत संदेश जायेगा। इससे उपनिवेशी शासकों का हौसला बढ़ेगा, नौकरशाही निरंकुश हो जायेगी तथा राजनीतिक हल्कों में निराशा की भावना जन्म लेगी।
नवम्बर 1923 को सम्पन्न हुये चुनावों में स्वराजियों को उल्लेखनीय सफलता मिली। सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली की 101 निर्वाचित सीटों में से उन्हें 42 में सफलता प्राप्त हुई। मध्य प्रांत में इन्हें स्पष्ट बहुमत मिला, बंगाल में ये सबसे बड़े दल के रूप में उभरे तथा उत्तर प्रदेश व बम्बई में भी इन्हें अच्छी सफलता मिली। सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली में स्वराजियों ने जिन्ना के नेतृत्व में उनके समर्थकों, उदारवादी व कुछ व्यक्तिगत विधायकों जैसे- मदन मोहन मालवीय इत्यादि के साथ मिलकर साझा राजनैतिक मोर्चा बनाया। विधान परिषद में स्वराजियों ने जिस साहस व जुझारूपन का परिचय दिया, उससे गांधीजी का यह विश्वास पक्का हो। गया कि स्वराजियों की रणनीति भले ही गलत हो वे साम्राज्यवादी प्रशासन के अंग नहीं बन सकते।
कुछ समय पश्चात् आतंकवाद को नियंत्रित करने के नाम पर सरकार ने नागरिक अधिकारों तथा स्वराजियों का दमन प्रारम्भ कर दिया। अक्टूबर 1924 में अनेक स्वराजी एवं कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए तथा उन्हें प्रताड़ित कर लिया गया। इनमें सुभाष चन्द्र बोस, अनिल बरन राय तथा एस.सी. मित्र इत्यादि प्रमुख थे। सरकार की दमनकारी नीतियों से गांधीजी असंतुष्ट हो गये तथा उन्होंने स्वराजियों के साथ एकता दर्शाने तथा उनका समर्थन करने का निश्चय किया।

Posted on by