वैश्विक उष्णन(ग्लोबल वार्मिंग)

जब वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि होती है तब पार्थिव विकिरण की अवशोषण दर बढ़ जाती है जिसे वायुमंडल के औसत तापमान में अधिक वृद्धि होती है ,यही स्थिति ग्लोबल वार्मिंग कहलाती है ।अन्य शब्दों में महासागर बर्फ की चोटी सहित पूरा पर्यावरण और धरती की सतह का नियमित गर्म होने की प्रक्रिया को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वातावरण के तापमान में वृद्धि देखी गई है ।संपूर्ण विश्व के पर्यावरणविद लंबे समय से चिंतित है कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से ग्रीन हाउस प्रभाव के चलते तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस से 4.8 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि संभव है और यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तब वैश्विक जलवायु में स्थानिक ,प्रादेशिक एवं अक्षांशीय स्तर पर इतना परिवर्तन हो जाएगा कि जय संकट उत्पन्न हो जाएगा । आज वैश्विक तापमान की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है तथा जलवायु परिवर्तन का मूल कारण भी बनी है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए वैश्विक तापमान का प्रयोग किया जाता है ।पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी के अनुसार पिछले शताब्दी में 0.8 डिग्री सेल्सियस के लगभग धरती के औसत तापमान में वृद्धि हुई है । ऐसा भी आकलन किया गया है कि अगली शताब्दी तक 2 डिग्री से 11.5 डिग्री की वृद्धि हो सकती है।
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