स्वराज पार्टी (भाग 4)

स्वराज पार्टी की स्थापना 

विधानमंडलों में स्वराजियों की गतिविधियां :-

1924 के अंत तक स्वराजियों की स्थिति काफी कमजोर हो चुकी थी। साम्प्रदायिक दंगे, साम्प्रदायिकता तथा उत्तरदायित्व या प्रतिरोध के मुद्दे पर स्वराजियों के खेमें में विभाजन इसके लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी थे। 16 जून 1925 को सी.आर. दास की मृत्यु से उन्हें और गहरा आघात लगा।
स्वराजियों के खेमें में उत्तरदायित्व की अवधारणा के समर्थक कुछ नेताओं जैसे- लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय तथा एन.सी. केलकर ने सरकार के साथ समर्थन तथा हिन्दू हितों की रक्षा के लिये सत्ता में यथासंभव भागीदारी की वकालत की।
उन्होंने मोतीलाल नेहरू जैसे अ-प्रतिक्रियावादियों पर आरोप लगाया कि वे मांसाहारी तथा हिन्दू हितों के विरोधी हैं। इसके पश्चात् लाला लाजपत राय एवं मदन मोहन मालवीय ने स्वराज्य पार्टी छोड़ दी।
इसके अतिरिक्त भी स्वराज्य पार्टी को कमजोर करने वाली अनेक गतिविधियां चलती रहीं। तदुपरांत पार्टी को और अधिक टूट से बचाने, संसदीय भ्रष्टाचार रोकने तथा कार्यकर्ताओं को और अधिक निराशा से बचाने के लिये पार्टी के मुख्य नेतृत्व ने ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ के प्रति पुनः अपनी आस्था व्यक्त की तथा मार्च 1926 से विधान मंडल में भाग न लेने का फैसला किया।

दूसरी ओर स्वराज्य पार्टी के दूसरे खेमें ने नवम्बर 1926 के चुनावों का समर्थन किया तथा इसमें भाग लेने का फैसला लिया। किन्तु दुर्बलता के कारण इन चुनावों में पार्टी कोई महत्वपूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पायी और अंततः 1930 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्तावों तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) के छिड़ने के कारण स्वराजियों ने विधान मंडल का दामन छोड़ दिया।

स्वराजियों की उपलब्धियां :-

गठबंधन के सहयोगियों के साथ मिलकर स्वराजियों ने कई बार सरकार के विरुद्ध मतदान किया। यहां तक कि उन्होंने बजट संबंधी मांगों पर भी सरकार के विरुद्ध मतदान किया तथा स्थगन प्रस्ताव पारित किया।
स्वशासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा औद्योगीकरण के समर्थन में उन्होंने सशक्त भाषण दिये।
1925 में विट्ठलभाई पटेल ,सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली के अध्यक्ष चुने गये।
1928 में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (Public safety Bill) पर सरकार की पराजय, स्वराजियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस विधेयक में यह प्रावधान था कि सरकार अवांछित तथा विध्वंसकारी चरित्र वाले विदेशियों को देश से निवासित कर सकती है। (इसका प्रमुख कारण तत्कालीन समय में समाजवाद एवं साम्यवाद का तेजी से प्रचार था। भारत में ब्रिटिश सरकार इस दिशा में पहले से ही सतर्क थी। सरकार का विश्वास था कि कामिंटर्न द्वारा भेजे गये विदेशी, भारत में ब्रिटिश सरकार की अस्थिर करने का प्रयास कर सकते हैं)।

स्वराजियों की गतिविधियों ने ऐसे समय में राजनीतिक निर्वात को भर दिया, जबकि राष्ट्रीय आंदोलन धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्य खोता जा रहा था तथा उसके सम्मुख राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हो गयी थी।
उन्होंने मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों का खोखलापन उजागर कर दिया।
उन्होंने विधानमंडलों में सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन किया तथा उपयुक्त मंच के रुप में इसका उपयोग किया।

स्वराजियों की कमजोरियां :-

स्वराजी विधानमंडलों के भीतर अपने जुझारू संघर्ष तथा विधानमंडलों के बाहर राजनीतिक संघर्ष के मध्य समन्वय नहीं स्थापित कर पाये। वास्तव में ये लोग महज अखबारों में छपी खबरों पर ही विश्वास करने लगे थे।
व्यवधानवादी राजनीति की भी अपनी कुछ सीमायें हैं।
वे अपने सहयोगी घटकों का भी हमेशा और हर अवसर पर साथ नहीं प्राप्त कर सके। टकराववादी विचारधारा के कारण उनका प्रभाव व्यापक नहीं हो सका।
वे विधानमंडलों की शक्तियों एवं विशेषाधिकारों का पूर्ण उपयोग करने में असफल रहे।
बंगाल में बहुसंख्यक स्वराजियों ने जमींदारों के विरुद्ध काश्तकारों की मांगों का समर्थन नहीं किया, इससे काश्तकार नाराज हो गये। इनमें बहुसंख्यक मुसलमान थे।
वे पार्टी में घुसपैठ कर रहे साम्प्रदायिक तत्वों को रोकने में असफल रहे।

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