क्रमशः - (जीवधारियों का पांच-जगत वर्गीकरण मुख्यतः निम्न लक्षणों पर आधारित है:) - के आगे -
(c) जीवन पध्दति – जीवन-यापन की पध्दति जीवधारियों के वर्गीकरण का एक मुख्य आधार है। वे जीवधारी जो अपना भोजन वातावरण के अकार्बनिक पदार्थों एवं सौर ऊर्जा की सहायता से स्वयं निर्मित करते है, प्राथमिक उत्पादक कहलाते हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यतः स्वपोषित वर्ग के हरे पौधे आते हैं। ऊर्जा के लिए प्राथमिक उत्पाद पर निर्भर रहने वाले जीवों को उपभोक्ता कहते हैं। प्राणियों के मृत शरीर अथवा कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करके ऊर्जा प्राप्त करने वाले जीव अपघटक कहलाते हैं।
(d) शारीरिक संगठन की जटिलता – एककोशिकता और बहुकोशिकता। शरीर में कोशिकाओं की संख्या के आधार पर सभी जीवधारियों को दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है- एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय। एक कोशिकीय जीवों उदाहरण है – जीवाणु, क्लेमाइडोमोनास, अमीबा, इत्यादि। इन जीवों में समस्त जैविक क्रियाएं एक ही कोशिका में सम्पन्न होती हैं। एक कोशिकीय जीव सरलतम जीव माने जाते है। अधिकांश जीव अनेक कोशिकाओं के बने होते हैं। इनमें भी कुछ केवल एक ही प्रकार की कोशिकाओं के बने होते हैं, जबकि कुछ जीवों में विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं होती हैं जो विभिन्न प्रकार के विशिष्ट कार्यों में दक्ष होती है। पांच-जगत वर्गीकरण में अधिकांश एककोशिकीय यूकैरियोटी जीवों के लिए एक अलग जगत प्रोटिस्टा का प्रावधान किया गया है। बहुकोशिकीय जीवों को अन्य लक्षणों के आधार पर विभिन्न जगतों में सरलता से जटिलता के क्रम में रखा गया है।
अगले नोट्स में चलते है जीवों के नामकरण पर ...