आई.पी.सी. की धरा 377 आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित

6 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के 5 सदस्य संवैधानिक पीठ ने नवजोत सिंह जोहर अन्य बनाम भारत संघवाद के साथ विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक मत से आई पी सी की धारा 377 को आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित किया।

- तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में 5 सदस्य संवैधानिक पीठ में शामिल अन्य न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, ए एम खानविलकर ,डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल थीं।

- निर्णय के अनुसार आईपीसी की धारा 377 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है तथा धारा 377  अतार्किक,असमर्थनीय और स्पष्ट रूप से मनमाना है।

- न्यायालय के अनुसार धारा 377 के तहत जानवरों के साथ किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि दंडनीय अपराध बनी रहेगी।

- ध्यातव्य है कि आई पी सी की धारा 377 अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित है जो किसी महिला पुरुष या जानवरों के साथ अप्राकृतिक रूप से यौनाचार करने वालों को आजीवन कारावास या 10 वर्ष के कारावास की सजा और जुर्माने का प्रावधान करती है।

- संविधान पीठ के अनुसार धारा 377 एलजीबीटी समुदाय के लोगों को परेशान करने का एक साधन था जिसके परिणाम स्वरूप उनके साथ भेद-भाव हुआ।

- न्यायालय ने कहा कि अदालतों को गरिमा के साथ जीने के अधिकार के रूप में व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करनी चाहिए जिसकी पहचान मौलिक अधिकार के रूप में की गई है।

- ध्यातव्य है कि वर्ष 2001 में नाज फाउंडेशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में धारा 377 को असंवैधानिक घोषित करने हेतु याचिका दाखिल की थी।

- 2 जुलाई 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

- 11 दिसंबर 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के विपरीत आईपीसी की धारा 377 को संवैधानिक घोषित किया था।

वर्ष 2016 में एनएस जोहर ,सुनील मेहता,रितु डालमिया ,अमरनाथ और आयशा कपूर द्वारा की याचिका दाखिल की गई इस याचिका को संविधान पीठ को सौंप दिया गया था।

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