आंग्ल - मैसूर संघर्ष

हैदर अली-

    हैदर अली का जन्म 1728 ई. में बुड़ीकोटा के एक साधारण परिवार में हुआ था। हैदर अली के पिता फ़तेह मोहम्मद मैसूर के किले में एक सैनिक अधिकारी थे।

    हैदर ने अपनी निरक्षरता की कमी को पूरा करने के लिए खंडेराव नामक ब्राह्मण को अपना पुरोहित नियुक्त किया। हैदर ने डिंडीगुल में एक आधुनिक शास्त्रागार स्थापित किया।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769)-

    यह युद्ध हैदर अली और अंग्रेजो के बीच लड़ा गया। युद्ध में विवश होकर अंग्रेजों ने 4 अप्रैल 1769 को एक सधि की जिसे मद्रास की संधि के नाम से जाना जाता है।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784)-

    इसके अंतर्गत वारेन हेस्टिंग्स ने 1782 में मराठों से सालबाई की संधि करके त्रिगुट से अलग कर दिया तथा निजाम को गुंटूर का जिला देकर उसे भी हैदर से अलग कर दिया।

    वारेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में 1782 में पोर्टोनोवा में हैदर आयरकूट से पराजित हुआ तथा घायल होने के कारण 7 दिसंबर 1782 को उसकी मृत्यु हो जाती है।

    इसी युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान ने 1784 में अंग्रेजों से एक सधि की जिसे मंगलौर की संधि कहा गया।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792)-

    यह युद्ध अंग्रेजो और टीपू सुल्तान के बीच हुआ जिसमें टीपू सुल्तान की पराजय हुई।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)-

    इस युद्ध में टीपू सुल्तान श्रीरंगपटटनम के दुर्ग पर लड़ता हुआ मारा गया।

    टीपू सुल्तान ने अपने नाम के सिक्के चलाए और महीनों के नाम हिंदू नाम के स्थान पर अरबी नामों का प्रयोग किया। टीपू, फ्रांसीसियों द्वारा बनाये गये श्रीरंगपट्टनम में जै-कोबिन क्लब का सदस्य था। टीपू ने श्रीरंगपट्टनम में स्वतंत्रता का वृक्ष भी लगाया

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