मधुबनी चित्रकारी , इसे से मिथिला की कला भी कहा जाता है। इसकी विशेषता चटकीले और विषम रंगों से भरे गए रेखा चित्र अथवा आकृतियां है। इस तरह की चित्रकारी पारंपरिक रूप में इस प्रदेश की महिलाएं ही करती आ रही हैं । लेकिन आज इस की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए पुरुष भी इस कला से जुड़ गए हैं। यह चित्र अपने आदि रूप और चटकीले और मटियाली रंगो के प्रयोग के कारण लोकप्रिय है । इस चित्रकारी से शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए खनिज रंगों का प्रयोग किया जाता है। यह कार्य ताजी पुताई की गई अथवा कच्ची मिट्टी पर किया जाता है।
वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए चित्रकारी अब कागज कपड़े , कैनवास आदि पर किया जा रहा है । काला रंग कागज और गोबर के मिश्रण से तैयार किया जाता ह।ै पीला रंग हल्दी अथवा पराग अथवा नींबू और बरगद की पत्तियों के दूध से लाल रंग कुसुम के फूल के रस अथवा लाल चंदन की लकड़ी से हरा रंग कठबेल वृक्ष की पत्तियों से सफेद रंग चावल या चुड़सी संतरी रंग पलाश के फूल से तैयार किया जाता है। रंगों का प्रयोग सपाट रूप से किया जाता है । जिन्हें न तो रंगत दी जाती है और ना ही कोई स्थान खाली छोड़ा जाता है।