कथकली ( केरल )
कथकली अभिनय , नृत्य और संगीत तीनों का समन्वय है ।
यह एक मूकाभिनय है जिसमें हाथ के इशारों और चेहरे की भावनाओं के सहारे अभिनेता अपनी प्रस्तुति देता है।
इस नृत्य के विषयों को रामायण , महाभारत और हिंदू पौराणिक कथाओं से लिया जाता है तथा देवताओं या राक्षसों को दर्शाने के लिये अनेक प्रकार के मुखौटे लगाए जाते हैं ।
केरल के सभी प्रारंभिक नृत्य और नाटक ,
जैसे - चकइरकोथू , कोडियाट्टम , मुडियाअट्टू , थियाट्टम , थेयाम , सस्त्राकली , कृष्णाअट्टम तथा रामाअट्टम आदि कथकली की ही देन हैं ।
इसे मुख्यत: पुरुष नर्तक ही करते हैं ,
जैसे - मकुद राज , कोप्पन नायर , शांता राव , गोपीनाथन कृष्णन , वी . एन . मेनन आदि ।
मोहिनीअट्टम ( केरल )
यह एकल महिला द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला ऐसा नृत्य है जिसमें भरतनाट्यम तथा कथकली दोनों के कुछ तत्त्व शामिल हैं ।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने भस्मासुर से शिव की रक्षा हेतु मोहिनी रूप धारण कर यह नृत्य किया था ।
मोहिनीअट्टम की प्रस्तुति चोलकेतु , वर्णम , पद्म , तिल्लाना , कुमी और स्वर के रूप में होती है ।
मोहिनीअट्टम नृत्य को पुनर्जीवन प्रदान करने में तीन लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती
है - स्वाति थिरूनल , राम वर्मा , बल्लतोल नारायण मेमन ( केरल मंडलम संस्था के संस्थापक ) और कलामंडलम कल्याणकुटटी अम्मा ( द मदर ऑफ मोहिनीअट्टम ) ।
कुचिपुड़ी ( आंध्र प्रदेश )
आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में कुचिपुड़ी नामक गाँव है जहाँ के द्रष्टा तेलुगु वैष्णव कवि सिद्धेद्र योगी ने यक्षगान के रूप में कुचिपुड़ी शैली की कल्पना की ।
भामाकल्पम् और गोलाकल्पम् इससे जुड़ी नृत्य नाटिकाएँ हैं । कुचिपुड़ी में स्त्री - पुरुष दोनों नर्तक भाग लेते हैं और कृष्ण - लीला की प्रस्तुति करते हैं । कुचिपुडी में पानी भरे मटके को अपने सिर पर रखकर पीतल की थाली में नृत्य करना बेहद लोकप्रिय है ।
इस नृत्यशैली के प्रमुख नर्तकों में भावना रेड्डी , यामिनी रेड्डी , कौशल्या रेड्डी , राजा एवं राधा रेड्डी आदि शामिल हैं ।
सत्रीय नृत्य ( असम )
असम के 15वीं सदी के महान वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव ने मठों में ‘ अंकिया नाट ' के सह - प्रदर्शन हेतु सत्रीया नृत्य विकसित किया।
इस नृत्य को कई विधाओं में बाँटा गया है ,
जैसे - अप्सरा नृत्य , बेहतर नृत्य , चाली नृत्य , दशावतार नृत्य , मंचोक नृत्य , रास नृत्य आदि।
सत्रीया नृत्य में शंकरदेव द्वारा संगीतबद्ध रचनाओं का प्रयोग होता है जिसे बोरगीत कहते हैं ।
इस नृत्यशैली को संगीत नाटक अकादमी द्वारा 15 नवंबर , 2000 को अपने शास्त्रीय नृत्य की सूची में शामिल किया गया जिससे शास्त्रीय नृत्यों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है ।
सत्रीया नृत्य के मुख्य नर्तकों में मनीराम दत्ता मोकतर , बापूराम बयन अलाई , इंदिरा पी . पी. बोरा , परमानंद बोरबयन , जतिन गोस्वामी , भयन मोटर आदि हैं।
ओजा पल्लि भी असम का एक नृत्य है ।