D.N.A. Fingerprinting and Cloning

    D.N.A. में मनुष्य का अनुवांशिक कोड होता है तथा इसके रेखाचित्र से व्यक्ति विशेष की पहचान की जाती है। जैसे दो व्यक्तियों के अंगूठे के निशान नहीं मिल सकते और पहचानने के लिए उनके प्रिंट फिंगरप्रिंट के रूप में लिए जाते हैं, वैसे ही जीवित या मृत व्यक्ति के D.N.A. चित्र आपस में नहीं मिल सकते इसी आधार पर व्यक्तियों की पहचान हो पाती हो और इस तकनीक को D.N.A. फिंगरप्रिंट कहते हैं।

    नाइट्रोजन छारों के अनुक्रम के आधार पर किसी व्यक्ति के पहचानने की विधि को D.N.A. फिंगरप्रिंट कहते हैं। आजकल इस तकनीक का प्रयोग अपराधियों की धरपकड़ तथा बच्चों संबंधी होने वाले विवाद को सुलझाने के लिए किया जाता है।

    भारत में इस तकनीक को लाने का श्रेय हैदराबाद के वैज्ञानिक डॉ लालजी सिंह का विशेष योगदान है जो सेंटर आफ सेलुलर एवं मॉलिक्यूलर बायोलॉजी हैदराबाद संस्थान में कार्यरत हैं।

CLONING-

    Clone शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है टहनी होता है।

    Cloning का सामान अर्थ समरूप होता है क्लोन शारीरिक रूप से ही नहीं वरन आनुवंशिक गुणों में भी अपने जनक के समरूप होते हैं अर्थात अपने जनक के फोटो काफी होते हैं जिस विधि अथवा तकनीक द्वारा क्लोन तैयार किए जाते हैं उसे क्लोनिंग कहते हैं।

    Cloning प्रक्रिया में नाभिक स्थानांतरण द्वारा कोशिका के नाभिक को निकाल लिया जाता है तत्पश्चात नाभिक रहित डिंब अंडाणु में प्रस्थापित कर दिया जाता है फिर अन्य विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा कोशिका विभाजन करके एक अंडाणु का विकास किया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत पूर्ण विकसित अंडाणु को पुनः मां के गर्भ में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। जहां गर्भकाल के दौरान बच्चे का विकास एवं जन्म होता है।

    इस प्रकार की संतान उत्पन्न करने के लिए नर एवं मादा के संभोग की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात यह अलैंगिक प्रजनन की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया की सीमा यह है कि cloning में नर से ली गई कोशिका केवल नर संतान ही बनाएगी और मादा की कोशिका केवल मादा संतान।

Posted on by