दर्पण (Mirror)
यह एक नियमित परावर्तक सतह होता है।
दर्पण का निर्माण किसी पारदर्शी शीशे के एक सतह की कलई (Polish) करके किया जाता है।
कलई करने के लिए सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) या पारे (Mercury - Hg) का प्रयोग किया जाता है।
दर्पण को समतल (Plane) एवं गोलीय (Spherical) दो वर्गों में विभाजित किया जाता है।
समतल दर्पण
इसके दोनों तल सपाट (Flat) होते हैं।
इस दर्पण में बनने वाला प्रतिबिम्ब वस्तु के बराबर बनता है। प्रतिबिम्ब का आकार-प्रकर वस्तु का दर्पण से दूरी पर निर्भर नहीं करता है।
प्रतिबिम्ब की स्थिति एवं प्रकृति निम्नांकित होती है-
i प्रतिबिम्ब दर्पण के उतना ही पीछे बनता है, जितना आगे वस्तु दर्पण के रहता है।
ii सीधा, उभयपार्शिवीय (Invertelly lateral) वस्तु के बराबर तथा काल्पनिक (Imaginary) होता है।
iii यदि वस्तु दर्पण की ओर V वेग से गतिशील हो तो प्रतिबिम्ब 2 V वेग से वस्तु की ओर गतिशील प्रतीत होता है।
iii किसी वस्तु का पूर्ण प्रतिबिम्ब देखने के लिए दर्पण की ऊँचाई कम से कम वस्तु की आधी होनी चाहिए।
iv यदि दो दर्पणों के बीच का कोण हो तो उनके बीच रखी वस्तु के 360/q प्रतिबिम्ब प्राप्त होते हैं। 360/q के सम होने पर कुल प्रतिबिम्ब की संख्या 360/q-1 के बराबर होता है।