बेरोजगारी की समस्या एक सामान्य समस्या है। चाहे वह देश विकसित हो या कम विकसित हो किसी भी देश में रोजगार का स्तर आर्थिक विकास के स्तर पर निर्भर करता है। जैसे देशों के राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होती है।
क्लासिकल और अर्थशास्त्रियों के अनुसार पूर्ण रोजगार एक सामान्य दशा होती है। और यदि किसी कारण से अल्प मात्रा में बेरोजगारी पाई भी जाती है। तो वह स्वत: समायोजित हो जाती है। जबकि कींस का विचार था। कि बेरोजगारी का कारण समग्र मांग और प्रभावपूर्ण मांग में कमी से होता है। अतः कींस ने सुझाव दिया था। कि बेरोजगारी को घटाने के लिए प्रभावपूर्ण मांग को बढ़ाना चाहिए। भारत में बेरोजगारी की समस्या प्रभावपूर्ण मांग की कमी के कारण जैसे कींस ने अपने सिद्धांत में बताया भारत में बेरोजगारी की समस्या संरचनात्मक है। अतः भारत में बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए एक संरचनात्मक सुधार किए गए भारत में गरीबी और बेरोजगारी का मूल्यांकन राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण (NSSO) द्वारा किया जाता है। NSSO द्वारा बेरोजगारी के संबंध में टी प्रकार के आंकड़े उपलब्ध कराए जाते हैं।
1. सामान्य बेरोजगारी का स्तर
2. वर्तमान साप्ताहिक बेरोजगारी का स्तर
3. वर्तमान दैनिक बेरोजगारी का स्तर
वर्ष 2013-14 में बेरोजगारी के संबंध में एक सर्वेक्षण किया गया जिस के अनुसार भारत में कुल बेरोजगारी का स्तर 4.9%जिसमें ग्रामीण बेरोजगारी 4.7% जबकि शहरी बेरोजगारी 5.5% वर्ष 2013 के रोजगार गणना के आंकड़ों के अनुसार 2005-13 के बीच रोजगार में 34.35% की वृध्दि पायी गयी। इस दौरान कुल 12.77 करोड़ लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। जिसमें 6.14 करोड़ लोग शहरी क्षेत्र के थे। जबकि 6.63 करोड़ रोजगार के अवसर ग्रामीण क्षेत्र में प्राप्त हुए। इस प्रकार जबकि 2009-10 में 7.24 वृध्दि पायी गयी थी। 2014-15 में 7.5% वृध्दि दर पाई गई थी।