इस ग्रन्थ की रचना अलबरूनी ने अरबी भाषा में की थी। सर्वप्रथम 1888 ई . में एडवई साची ने अरबी भाषा से इस ग्रन्थ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया। अंग्रेजी भाषा से इसका अनुवाद हिन्दी भाषा में रजनीकान्त शर्मा द्वारा किया गया तथा ‘ आदर्श हिन्दी पुस्तकालय', इलाहाबाद से उसे प्रकाशित करवाया।
अलबरुनी का जन्म 973 ई . में खीवा में हुआ था। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की और एक ख्यातिप्राप्त विद्वान हो गया। 1017 ई . में महमूद गजनवी ने खीवा को जीता और वहाँ अलबरुनी को एक युद्ध - बन्दी के रूप में प्राप्त किया। वह उसकी योग्यता से प्रभावित हुआ और उसने अलबरुनी को अपने दरबार के विद्वानों में स्थान प्रदान किया। अलबरुनी महमूद गजनवी के साथ उसके भारत पर किये गये आक्रमणों के अवसरों पर उसके साथ आया। भारत आने से पहले तक अलबरुनी एक राजनयिक के रूप में खीवा वंश की, शासन की सेवा में था। उसने यहाँ संस्कृत भाषा, भारतीय दर्शन और ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया। अलबरुनी पर यूनानी विचारकों का भी प्रभाव पड़ा, उसने प्रमुख यूनानी विचारकों को अरबी पुस्तकों से जाना था। उसने अपनी कृतियों में अरस्तू व प्लेटो का वर्णन किया है। उसने अपने विभिन्न ग्रन्थों में भारत के विषय में लिखा जिनमें से तहकीक - ए - हिन्द में दिये गये विवरण को बहुत प्रामाणिक माना गया है। अलबरूनी ने महमूद गजनवी के समय के भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक स्थिति के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है। तहकीक - ए - हिन्द एक विस्तृत ग्रन्थ है जिसमें 80 अध्याय हैं । अलबरुनी ने महमूद गजनवी के उत्तराधिकारी मसद का संरक्षण भी प्राप्त किया । 1048 ई . में उसकी मृत्यु हुई ।
अलबरूनी ने भारत की जलवायु , प्राकृतिक स्थिति , भाषा , रीति - रिवाज , सामाजिक परम्पराएँ , धर्म , भारतीयों के कर्म - सिद्धान्त , जीव के आवागमन के सिद्धान्त , मोक्ष - सिद्धान्त आदि के सम्बन्ध में लिखा। उसने भारतीयों के भोजन , वेश - भूषा , मेलों , धार्मिक उत्सवों , मनोरंजन के साधनों आदि के विषय में भी लिखा। उसने अपने विवरण में भगवद् - गीता , वेदों , उपनिषदों , पतंजलि के योग - शास्त्र आदि के विषय में भी लिखा । इस प्रकार , अलबरुनी ने भारतीय जीवन के प्रायः सभी पक्षों के बारे में लिखा ।