राजनीतिक स्थिति के विषय में अलबरूनी ने केवल उत्तरी भारत, गुजरात,कन्नौज , पाटलिपुत्र , मुंगेर आदि के बारे में ही लिखा । दक्षिण - भारत के किसी भी राज्य के विषय में कुछ भी नहीं है । उसने लिखा कि भारतीय शासको मैं कोई पारस्परिक एकता नहीं है और विदेशी आक्रमण के अवसर पर वे कभी भी मिलकर एक नहीं हुए । उसने भारतीय जाति - प्रथा की कठोरता , उसके दुष्परिणाम और अछूतों की स्थिति के बारे में लिखा । उसने लिखा कि जाति - प्रथा इतनी कठोर है कि यदि एक बार एक व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाये तो उसे पुनः जाति में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। उसने भारतीयों की सामाजिक कुरीतियों मुख्यतया सती - प्रथा के बारे में लिखा। उसके अनुसार भारतीय अभिमानी थे। वे अपनी भाषा , संस्कृति , देश आदि सभी को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। अलबरुनी ने हिन्दू मन्दिरों मूर्तियों और बौद्ध - मठों तथा विहारों का भी वर्णन किया। उसके कथनानुसार भारत में वैष्णव - सम्प्रदाय सबसे अधिक लोकप्रिय था और प्रायः सभी भारतीय मूर्ति - पूजक थे । उसके अनसार भारत आर्थिक दृष्टि से एक सम्पन्न देश था । उसने भारतीयों की मुद्रा - व्यवस्था और नाप - तौल के साधनों के सम्बन्ध में भी लिखा । उसके विवरण के अनुसार भारत में विदेशी व्यापार की तुलना में आन्तरिक व्यापार अधिक मात्रा में था । उसने लिखा कि भारतीय राजाओं को अपनी प्रजा से कर लेने का अधिकार था और कृषकों से वह उत्पादन का 1 / 6 भाग लगान के रूप में लेते थे जो उनकी आय का मुख्य साधन था । उसके अनुसार भारत धनवान देश था यद्यपि महमूद ने उसकी समृद्धि को लूटकर नष्ट किया।
इस प्रकार , तहकीक - ए - हिन्द में भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों का विवरण दिया गया है और उसे तत्कालीन भारत के राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के बारे में जानने का एक उपयोगी सात - ग्रन्थ माना गया है।