भारत में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों की समस्या -1 ( Problems of religious minorities in India)

धार्मिक आधारों पर भारत एक बहुलवादी समाज है। अता हिंदुओं को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक समूह कहा जा सकता है यह अनिवार्य नहीं है कि हर एक अल्पसंख्यक समूह किसी ना किसी समस्या से ग्रसित हो भारत में ऐसे धार्मिक समूह है जैसे कि यहूदी पारसी जैन इत्यादि जो धार्मिक आधारों पर भिन्न तो है परंतु किसी भी प्रकार की समस्या से ग्रसित नहीं है।
अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक रूप से भिन्न होना अनिवार्य रूप से समस्या का कारक नहीं हो सकता।यदि संख्या के आधार पर हीन होना एक समस्या हो तो कहा जा सकता है कि यही एक मात्र समस्या है जिससे पूरे विश्व में हर एक अल्पसंख्यक ग्रसित है परंतु भारत अथवा विश्व के किसी भी हिस्से में संख्या के आधार पर हीनता को एक समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सामान्यता पूरे विश्व में अल्पसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यक चेतना से ग्रसित होते हैं। अल्पसंख्यक चेतना एक विशिष्ट प्रकार की सोच है जो कि अल्पसंख्यक समूहों में उपस्थित होती है यह चेतना असुरक्षा के भाव एवं उत्पीड़न के भाव का समीकरण है अल्पसंख्यक समूहों में असुरक्षा के भाव के उपस्थित होने का प्रमुख कारण यह है कि वे यह मान लेते हैं कि बहुसंख्यक समूह धार्मिक राष्ट्रीयकरण की आड़ में उनके विशिष्ट धार्मिक पहचान को हमेशा के लिए खत्म कर देगी।
दूसरी और उत्पीड़न के भाव का प्रमुख आधार यह है कि अल्पसंख्यक समूह यह मान लेते हैं कि क्योंकि वह संख्या के आधार पर कम है बहुसंख्यक समूह व्यक्तित्व रूप से उन्हें अपमानित एवं उनका शोषण करेगी।यह अल्पसंख्यक चेतना बहुसंख्यक समूह एवं अल्पसंख्यक समूहों के बीच अविश्वास के भाव को जन्म देती है इसके लिए दोनों ही समुदाय के सदस्य समान रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं। क्योंकि अविश्वास का भाव प्रतीत होता है अल्पसंख्यक समूह के सदस्य मुख्य धारा से पृथक रह जाते हैं इसके कारण वे सामाजिक एवं आर्थिक रुप से पिछड़ जाते हैं। अल्पसंख्यक समूह अपनी आर्थिक स्थिति की तुलना बहुसंख्यक समूह के साथ करती है एवं तुलनात्मक रूप से वंचित महसूस करती है । यह द्वेष के एक भाव को जन्म देती है जो कि संघर्ष का एक कारण बन जाती है धर्म एवं धार्मिक अंतर का प्रयोग मात्र एक माध्यम के रूप में किया जाता है इसे एक बहाना मात्र कहा जा सकता है।
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