भारत में मुसलमान ईसाई एवं आंशिक रूप से सिक्ख किसी ना किसी समस्या से ग्रसित रहे हैं, जबकि अन्य अल्पसंख्यक समूह ऐसी किसी भी समस्या से प्रभावित नहीं रहे हैं। मुसलमानों के संदर्भ में कहा जा सकता है कि देश के विभाजन के दौरान मुसलमानों में जो अभिजन वर्ग था पाकिस्तान पलायन कर गया एवं इस समुदाय में वे लोग जो कि आर्थिक रूप से पिछड़े थे वे देश में रह गए। मुसलमान देश में नेतृत्व विहीन रह गया भारत में मुसलमान राजनेता तो थे परंतु वह मुसलमानों के नेता नहीं थे।दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव में मुसलमानों का नेतृत्व उलेमा अर्थात धार्मिक गुरुओं ने किया। यह धार्मिक नेता रूढ़िवादी रहे अतः इनके नेतृत्व में यह समुदाय पुनः प्रवर्तन वादी बनता गया। देश में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार हो रहा था परंतु देश का मुसलमान धार्मिक शिक्षा तक ही सीमित रहा।आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव में बेरोजगार योग्य ना बन सके अतः औद्योगिकरण की प्रक्रिया से उत्पन्न अवसरों को भी प्राप्त करने में असमर्थ रहे।
देश के विभाजन के दौरान घटी हिंसा असुरक्षा के भाव को जन्म दिया। अतः आज भी मुसलमान झुंड में एक ही बस्ती में आवास को वरीयता देते हैं।
इस ने मुसलमानों के भौगोलिक गतिशीलता को प्रभावित किया। इसके कारण भी मुसलमान पिछड़े रहे।आज भी भारत में मुसलमान अत्यधिक निकृष्ट व्यवसाय से संबंधित है।लगभग 45% शहरी मुसलमान एवं 39% ग्रामीण मुसलमान आज भी भारत में गरीबी रेखा से नीचे हैं। यह दर्शाता है कि वह सामाजिक एवं आर्थिक रूप से आज भी वंचित हैं।