भारत में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों की समस्या-3 (problem of religious minorities in India)

इस्लाम की तरह ही ईसाई धर्म भी भारत की आंतरिक उत्पत्ति नहीं है।भारत में इसका आगमन यूरोपियों के आगमन के साथ हुआ मुख्यत: अंग्रेजों के आगमन का प्रभाव सर्वाधिक रहा।अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य धर्म संसाधन एवं अपना कीर्तिमान स्थापित करने का था।
अंग्रेजों का उद्देश्य भारत से ना सिर्फ संसाधनों के दोहन का था बल्कि भारत पर धर्म के माध्यम से भावनात्मक नियंत्रण स्थापित करने का भी था। इस उद्देश्य से ईसाई मिशन एरिया जनजाति क्षेत्रों में व्यापक रूप से सक्रिय रही। एक नवीन धर्म की उत्पत्ति एवं उसका प्रसार पहले से उपस्थित प्रमुख धर्म के लिए खतरा बन जाता है अतः धार्मिक संघर्षों के रूप में देश में प्रतिशोध देखा गया।

सिखों के साथ उपस्थित समस्याएं अस्थाई थी साथ ही वे राजनैतिक ज्यादा एवं धार्मिक कम थी।पंजाब में अकाली दल की उत्पत्ति कांग्रेस के वर्चस्व के लिए खतरा बन रही थी यह एक धार्मिक दल के रूप में उत्पन्न हो रही थी। अतः संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से कांग्रेस ने जरनैल सिंह भिंडरावाले से समर्थन प्राप्त किया।वह धार्मिक नेता थे परंतु उनके समर्थन से कांग्रेस को राजनैतिक लाभ प्राप्त हुआ। इसने जरनैल सिंह भिंडरावाले के राजनैतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ावा दिया।हरित क्रांति के कारण पंजाब व्यापक रूप से कृषि प्रधान हो चुका था यह औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में पिछड़ चुका था। इसके कारण बेरोजगारी की दर भी उच्च थी इसके कारण युवा वर्ग में असंतोष का भाव था जो कि एक आंदोलन के लिए परिस्थितियां अनुकूल थी जरनैल सिंह भंडार वाले ने इस असंतोष का लाभ एवं खालिस्तान आंदोलन को जन्म दिया। अंततः ऑपरेशन ब्लू स्टार एवं इंदिरा गांधी की हत्या ने व्यापक संघर्ष को जन्म दिया परंतु एक बार इस आंदोलन के दमन के बाद पंजाब में दोबारा ऐसी समस्या उत्पन्न नहीं हुई।

Posted on by