एक विचारधारा के रूप में संप्रदाय वाद के तीन प्रमुख आधार है
१-पहला आधार यह है कि एक धार्मिक समूह के सदस्य मान लेते हैं कि सभी सदस्यों के धार्मिक हित समान है।
२-दूसरा आधार यह है कि किसी भी अन्य धार्मिक समूह के धार्मिक हित भिन्न होते हैं।
३-तीसरा आधार यह है कि एक धार्मिक समूह के सदस्य मान लेते हैं कि किसी अन्य धार्मिक समूह के हित ना सिर्फ उनके हितों से भिन्न है बल्कि उनके हितों के विरुद्ध भी हैं।
यदि निम्न में से पहले दो आधार उपस्थित हूं तब यह उदार सांप्रदायिकता को जन्म देगी। यह उदार सांप्रदायिकता समाज में उपस्थित धार्मिक सामंजस्य के लिए एक खतरा नहीं है। यह किसी भी धार्मिक समूह के भीतर सदस्यों के बीच एकता को जन्म देती है। यदि तीसरी मान्यता भी उपस्थित हो तब यह उग्र संप्रदायिकता को जन्म देगी।यह दो या दो से ज्यादा धार्मिक समूहों के बीच गैस के भाव को जन्म देती है जिससे धार्मिक संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
यह धार्मिक सामंजस्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है।
भारत जैसे धार्मिक बहुलवादी समाज में उदार सांप्रदायिकता एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन भारत में उग्र सांप्रदायिकता एक आधुनिक प्रक्रिया है।इसकी उत्पत्ति मुख्यतः ब्रिटिश काल में प्रारंभ हुई।1857 के विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश शासन को यह आभास हुआ कि यदि हिंदू व मुसलमान एकजुट रहते हैं तब ऐसे में प्रभावशाली रूप में भारत पर वर्चस्व स्थापित करना कठिन होगा।
"अतः उन्होंने फूट डालो एवं शासन करो" की नीति अपनाई।
इस नीति के अंतर्गत कई आधारों पर समाज का विभाजन किया गया जिनमें से एक आधार धर्म भी था।
1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया गया कारण प्रशासनिक क्रियाओं को और ज्यादा प्रभावी बनाने का दिया गया। परंतु वास्तविक कारण अथवा उद्देश्य हिंदू बाहुल्य क्षेत्र को मुसलमान बाहुल्य क्षेत्र से पृथक करने का था
ऐसा इसलिए भी किया गया क्योंकि बंगाल भारत में एक प्रमुख राष्ट्रवादी क्षेत्र के रूप में उभर रहा था। यह ब्रिटिश शासन द्वारा बुना गया एग्जाम था जिसमें भारतीय राजनेता उलझ गए। इस विभाजन के विरोध में भारतीय राजनेताओं ने धार्मिक अनुरोध ओं के माध्यम से जनता को लामबंद करने का प्रयास किया। पहली बार भारत में भारतीय राजनेताओं ने राजनीतिक उद्देश्य से धर्म का प्रयोग किया। धर्म को राजनीति से पूर्णता पृथक रखना चाहिए ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी धर्म का मिश्रण राजनीति के साथ किया जाता है धर्म उग्र बन जाता है एवं राजनीति विनाशकारी।