कांग्रेस को एक धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में देखा जाता था अतः कांग्रेस के प्रति संतुलन के लिए अंग्रेजी शासन ने हिंदू महासभा एवं मुस्लिम लीग जैसे धार्मिक दलों की उत्पत्ति का समर्थन किया। 1909 में प्रस्तावित मार्ले मिंटो सुधार ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था कि इसे स्वीकार कर कांग्रेस ने एक बड़ी भूल की। इस ने भी हिंदुओं एवं मुसलमानों के बीच विभाजन को जन्म दिया। 1919 में खिलाफत आंदोलन के नेतृत्व का महात्मा गांधी के निर्णय का उद्देश्य तो उचित था परंतु उसका परिणाम नकारात्मक रहा। यह एक धार्मिक मुद्दा था जिसका संबंध भारत के साथ किसी भी प्रारूप में नहीं था इसके परिणाम स्वरुप 1921 में मालाबार क्षेत्र में मोपला विद्रोह में हिंदू जमीदारों एवं मुसलमान श्रमिकों के बीच संघर्ष को जन्म दिया।
1933 में चौधरी रहमत अली ने पंजाब, अफगानिया,कश्मीर ,सिंधु एवं बलूचिस्तान को मिलाकर एक नए राष्ट्र के निर्माण की कल्पना प्रतिपादित की।प्रारंभ में इसे गंभीरता से नहीं लिया गया परंतु बाद में इसकी मांग वास्तव में उत्पन्न हुई।
1937 में हुए चुनाव को इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक माना जा सकता है।मुस्लिम लीग के निराशाजनक प्रदर्शन ने मोहम्मद अली जिन्ना को किसी भी साधन के प्रयोग के माध्यम से अपने राजनैतिक जनाधार के विस्तार के लिए विवश किया। उन्होंने जनता को लामबंद करने के उद्देश्य से धर्म का प्रयोग पूरा। 1946 में प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के अपने आवाहन में उन्होंने कांग्रेस को एक हिंदू दल घोषित किया। उन्होंने यह भी कहा कि इस देश में मुसलमान सुरक्षित नहीं है। इससे एक पृथक राष्ट्र की मांग को और ज्यादा बढ़ावा मिला जो कि उग्र होती गई जिसमें जान माल की व्यापक क्षति भी हुई।
इस उग्र सांप्रदायिकता ने अंततः देश के विभाजन को जन्म दिया।शासन व्यवस्था के रूप में आजादी के उपरांत भारत ने लोकतंत्र को अपनाया परंतु देश की जनतालोकतांत्रिक मूल्यों एवं मानदंडों से अवगत नहीं थी। देश के राजनीतिक दल भी देश के राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया में असफल रहे हैं।अतः लोगों का मतदान व्यवहार आज भी जाति धर्म जैसे पारंपरिक मूल्यों पर आधारित है। मुद्दों पर राजनीति की अनुपस्थिति होने के कारण आज भी देश के राजनीतिक दल धर्म के माध्यम से जनता को लामबंद करने का प्रयास करते हैं। अतः आज भी जब तक धर्म का प्रयोग राजनीति के उद्देश्य से होता रहेगा उग्र मानसिकता भारत में विद्यमान रहेगी।