भारत में धर्मनिरपेक्ष वाद-2

पश्चिमी देशों में पहले समाज का धर्मनिरपेक्षीकरण हुआ तत्पश्चात एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना सुनिश्चित की गई। एक धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना सरल होती है परंतु भारत में यह विरोधाभासी रहा।
भारत में समाज आज भी धार्मिक है परंतु राज्य धर्मनिरपेक्ष।
भारत में राज्य किसी धर्म को प्रायोजित नहीं करता है देश का संविधान भी धर्म पर आधारित नहीं है। यह धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। यह सभी धर्मों को समान सम्मान भी प्रदान करता है परंतु भारत में राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों में से एक जिम्मेदारी अल्पसंख्यक समूहों का सशक्तिकरण एवं उन्हें मुख्यधारा में लाने की भी है। अतः राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखने में असमर्थ रह जाता है।भारतीय समाज ना सिर्फ धार्मिक आधारों पर बहुलवादी है बल्कि यहां कई सारे पंथों की उपस्थिति भी देखी जा सकती है।अतः देश में ना सिर्फ प्रमुख धर्मों को ही बल्कि देश में उपस्थित सभी पंथों को भी समान सम्मान प्राप्त होता है। परंतु भारत जैसे एक धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना विरोधाभासी है। एक राज्य की जिम्मेदारियां सरकार निभाती है सरकार का निर्माण उसी समाज के सदस्यों से होता है एवं उसी समाज के सदस्य अपने प्रतिनिधियों का चयन करते हैं।ऐसी स्थिति में जब लोग ही धार्मिक हो तब ऐसे में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना संभव नहीं रह जाती है।आता है यह कहा जा सकता है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता मात्र शब्दों में उपस्थित है व्यवहारों में अनुपस्थित है।
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