बैंकों व्यवस्था में प्रयोग होने वाली शब्दावली भाग -1

• रेपो दर ( Repo Rate ) : ब्याज की वह दर जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक, वाणिज्यिक बैंकों को अल्पावधि कोष उधार देता हैं, वह रेपो दर कहलाती।
• उलटी रेपो दर (Reverse Repo Rale) : जिस दर पर केंद्रीय बैंक बाजार से ग्रहण प्राप्त करते हैं, वह उलटी रेपो दर कहलाती हैं।
• अग्रणी बैंक योजना ( Lead Bank Scheme ) : देश में ‘अग्रणी बैँक योजना' वर्ष 1969 से प्रभावी हुई। वर्ष 1968 में गठित की गई ‘गाडगिल समिति' की सिफारिशों के आधार पर इस योजना का सूत्रपात किया गया। इस योजना के तहत शाखा बँकिंग का विकास, साख सुविधाओं के विस्तार एवं आवंटित जिलों में साख आवश्यकताओं के सर्वेक्षण जैसे कार्यों पर ध्यान केन्द्रित किया गया।
• गैर - निष्पादनीय परिसम्पत्तियां ( Non - Performing As sets ) : बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा वितरित वे ऋण, जिनके मूलधन एवं उस पर देय ब्याज की वापसी या तो हो ही नहीं पाती अथवा समय सीमा के भीतर नहीं होती, गैर - निष्पादनीय परिसम्पत्तियों श्रेणी में आते हैं।
• मैग्नेटिंग इंक करेक्टर रिकॉग्नीशन कोड ( माइकर कोड ) : बैंकों के चेक नीचे मुद्रित 9 अंकों के कोड को ‘मैग्नेटिंग इंक करेक्टर रिकॉग्नीशन कोड (माइकर कोड) कहा जाता है। इस अंकीय कोड प्रथम तीन अंक बैंक की शाखा के शहर के नाम, आगे के अंक बैंक के नाम एवं अंतिम तीन अंक बैंक की शाखा पहचान से संबंधित होते हैं।
• इंडियन फाइनेंशियल सिस्टम कोड ( IFSC ) : यह कोड 11 अंकों होता है। प्रत्येक बैंक इसे अपने चेक पर मुद्रित करवाता हैं। इस अंकीय कोड के प्रथम 4 अंक बैंक के नाम से संबंधित होते हैं बीच के एक शून्य के बाद 6 अंकों का संबंध बैंक की शाखा के विवरण से होता है।
 

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