21 नवंबर, 1963 की शाम को थुंबा, केरल की सेंट मैरी मैग्डालेन चर्च से भारत के पहले रॉकेट ‘नाइक अपाचे’ का प्रक्षेपण किया गया। यह रॉकेट हमें अमेरिका ने दिया था। इसी प्रक्षेपण के साथ भारतीय रॉकेट विज्ञान का उद्भव होता है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई ने एपीजे अब्दुल कलाम को 6 महीने के लिए विशेष प्रशिक्षण हेतु ‘नासा’ भेजने का प्रबंध किया था। कलाम के सामने ही यह रॉकेट निर्मित हुआ था।
तब हमारे पास रॉकेट प्रक्षेपण के लिए कोई केंद्र नहीं था। अतः मजबूरी में उक्त चर्च की दीवार के सहारे ‘नाइक अपाचे’ को दागा गया।
यह अपने आप में रोमांचक किंतु मनोरंजक प्रकरण था जिसकी चर्चा डॉ. कलाम ने अपनी आत्मकथा ‘Wings of Fire’ में कुछ इस प्रकार की है-‘रॉकेट को ले जाने के लिए उपकरण के नाम पर हमारे पास एक ट्रक और हाथ से चलाई जाने वाली हाइड्रोलिक क्रेन थी। जोड़कर तैयार किए गए इस पूर्ण रॉकेट को चर्च से प्रक्षेपण स्थल तक ट्रक से ले जाया गया। जब रॉकेट को क्रेन से उठाया गया और लांचर पर रखा जाने लगा, तभी इसमें झुकाव आना शुरू हो गया। क्रेन की हाइड्रोलिक प्रणाली में रिसाव आने से यह गड़बड़ी उत्पन्न हो रही थी। तब रॉकेट को हम लोगों ने ही हाथों और कंधों पर उठा लिया और लांचर पर स्थापित कर दिया। इस रॉकेट प्रक्षेपण और इसकी सुरक्षा प्रणाली का प्रभारी मैं ही था। इस रॉकेट को छोड़े जाने में मेरे दो साथियों-डी. ईश्वरदास और अर्वामुदन- ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका निभाई। रॉकेट का प्रक्षेपण बहुत ही आसानी से तथा बिना किसी कठिनाई के हो गया। हमें उड़ान संबंधी आंकड़े बहुत ही बेहतर मिले और हम काम पूरा करके गर्व से सिर ऊंचा किए लौटे।’
परिज्ञापी रॉकेटों का दौर
पृथ्वी के निचले वायुमंडल का अध्ययन करने के लिए छोड़े जाने वाले छोटे-छोटे रॉकेटों को ‘परिज्ञापी रॉकेट’ (Sounding Rockets) कहते हैं। अमेरिका द्वारा प्रदत्त ‘नाइक अपाचे’ भी इसी कोटि का रॉकेट था।
फिर अमेरिका ने हमें एक और साउंडिंग रॉकेट दिया जिसका नाम हमने Rh-70 (रोहिणी-70) रख दिया जिसका अर्थ यह है कि इसका व्यास 70 मिमी. था।
इसके बाद हमने अपना स्वदेशी रॉकेट बना लिया जिसे ‘रोहिणी-75’ (Rh-75) नाम से अभिहित किया गया। इसका व्यास 75 मिमी. था।
20 नवंबर, 1967 को भारत ने थुंबा से ‘रोहिणी-75’ नामक रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया तब अमेरिका ने ही इसे खिलौना कहकर हमारा मजाक उड़ाया था जिसने ही हमें ऐसे दो खिलौने दिए थे। पर जब ‘रोहिणी-75’ ने आशाजनक परिणाम प्रदर्शित किए तो एक स्वर से स्वीकारा गया कि मात्र आकार ही सब कुछ नहीं है। प्रश्न तो यह है कि तकनीकी रूप से दक्षता प्राप्त कर ली गई है अथवा नहीं?
डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई द्वारा वर्ष 1964 में फ्रांस से किए गए एक समझौते के अनुसार, भारत ने ‘सेन्तोर’ नामक दो खंडों वाले रॉकेट बनाने का मार्ग प्रशस्त कर लिया। अब तो विभिन्न रॉकेटों, उनसे संबद्ध उपकरणों के साथ 10 से अधिक रॉकेट प्रणालियां विकसित की जा चुकी हैं जिनमें Rh-75, Rh-100, Rh-125, Rh-300, Rh-560, मेनका-1, मेनका-2 आदि बहुखंडीय रॉकेट शामिल हैं। परिज्ञापी रॉकेटों की शृंखला का आखिरी रॉकेट ‘Rh-560’ था और इसी के साथ परिज्ञापी रॉकेटों की शृंखला समाप्त घोषित कर दी गई।
जब हमने केरल की जमीन को अधिगृहीत किया था, तब वहां कोई सुविधा नहीं थी। शनैः शनैः हमने इसे रॉकेट लांचिंग पैड के रूप में विकसित किया जिसका नाम ‘टर्ल्स’ अर्थात ‘थुंबा भू-मध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र’ (Thumba Equatorial Rocket Launching Station-TERLS) है। वर्ष 1967 में इंदिरा गांधी ने इस केंद्र को संयुक्त राष्ट्र को समर्पित कर दिया जिसका तात्पर्य यह है कि संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश यहां से अपने परिज्ञापी रॉकेटों का प्रक्षेपण कर सकता है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि इस प्रक्षेपण केंद्र से हम बड़े रॉकेटों का प्रक्षेपण नहीं कर सकते हैं, अतः हमने आगे चलकर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) में अपना लांचिंग पैड बनाया जिसका आरंभिक नाम ‘शार’ केंद्र (Shriharikota High Altitude Range-SHAR) था। ‘इसरो’ के सर्वाधिक अवधि तक अध्यक्ष रह चुके प्रो. सतीश धवन के निधन के बाद इसका नामकरण अब ‘सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र’ (Satish Dhawan Space Centre-SDSC) कर दिया गया है।
भारत का पहला रॉकेट : एसएलवी-3
परिज्ञापी रॉकेटों की विकास यात्रा के बाद भारत ने एपीजे अब्दुल कलाम के निर्देशन में भारत के पहले रॉकेट ‘एसएलवी-3’ (Satellite Launching Vehicle) के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ की। इसके लिए हमने ‘रोहिणी’ शृंखला के उपग्रहों का निर्माण किया जिनका उद्देश्य ही इस बात की जांच करना था कि हमारा SLV-3 रॉकेट 38-40 किग्रा. वजनी उपग्रहों को पृथ्वी की 400-500 किमी. की निचली कक्षा में स्थापित कर सकता है या नहीं?
इसका प्रथम परीक्षण 10 अगस्त, 1979 को किया गया। यह SLV-3 की प्रथम प्रायोगिक उड़ान (First Experimental Flight) थी। रॉकेट उड़ा तो जरूर पर चार-चरणीय रॉकेट के दूसरे खंड की नियंत्रण प्रणाली में खराबी आ जाने से (चौथे खंड के सक्रिय होने से पूर्व ही) आसमान में जाने की बजाय बंगाल की खाड़ी में जा समाया।
इस विफलता से अब्दुल कलाम (एसएलवी-3 के परियोजना निदेशक) बुरी तरह टूट चुके थे और उन्हें लगा कि इस विफलता की जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं के कंधों पर है लेकिन प्रो. ब्रह्म प्रकाश ने उन्हें संभाला, दिलासा दिलाया और इस प्रकार अब्दुल कलाम अवसाद से मुक्त हुए। बकौल कलाम ‘पहले चरण ने पूर्ण सफलता से अपना काम किया। हम एसएलवी-3 को उड़ता हुआ देखने की उम्मीदें लिए हुए थे लेकिन अचानक एक गड़बड़ी आ गई और हमारी उम्मीदों को धक्का लगा। रॉकेट का दूसरा चरण नियंत्रण से बाहर हो गया, 317 सेकंड के बाद ही उड़ान बंद हो गई और चौथे चरण सहित पूरा यान श्रीहरिकोटा से 560 किमी. दूर समुद्र में जा समाया।
इस घटना से हम सबको गहरा धक्का लगा। मुझे नाराजगी और निराशा दोनों हुई। आपको ‘इसका क्या कारण लगता है?’ किसी ने ब्लॉक हाउस में मुझसे यह पूछा। मैंने इसका जबाव ढ़ूंढ़ने की कोशिश की लेकिन मैं काफी थका हुआ था, अतः मैंने निरर्थक समझते हुए इसका कारण ढ़ूढ़ने की कोशिश छोड़ दी। प्रक्षेपण जल्दी सुबह हुआ था, पूरी रात उल्टी गिनती चली थी। पिछले एक हफ्ते से मुश्किल से ही थोड़ा सो पाया था। मानसिक और शारीरिक रूप से थका हुआ मैं अपने कमरे में गया और बिस्तर पर कटे पेड़ सा जा गिरा।
मेरे कंधों पर हाथ रखकर किसी ने मुझे जगाया। दोपहर खत्म हो चुकी थी और शाम होने जा रही थी। मैंने देखा, डॉ. ब्रह्म प्रकाश मेरे पास बैठे हुए हैं। ‘खाने का क्या हो रहा है?’ उन्होंने पूछा। उनका यह स्नेह व चिंता मुझे गहराई तक छू गई। मुझे बाद में पता चला कि इससे पहले भी दो बार डॉ. ब्रह्म प्रकाश मेरे कमरे में आए थे लेकिन मुझे सोता देखकर लौट गए थे। वह पूरे समय यह प्रतीक्षा करते रहे कि मैं उठ जाऊं और फिर उनके साथ दोपहर का भोजन करूं। मैं उदास तो था लेकिन अकेलापन नहीं लग रहा था। डॉ. ब्रह्म प्रकाश के साथ ने मेरे भीतर एक नया विश्वास जगाया। खाना खाते वक्त उन्होंने बहुत ही कम बातचीत की और सावधानीपूर्वक एसएलवी-3 के जिक्र से बचते हुए बहुत ही शालीनता से मुझे दिलासा दिया।’
और इस प्रकार प्रो. ब्रह्म प्रकाश जैसे तपोनिष्ठ विज्ञानी ने तरुण कलाम को संजीवनी शक्ति दी, अन्यथा आज कलाम को कोई जानता भी नहीं। अवसाद-विषाद ग्रस्त कलाम जाने कब के गुमनामियों के अंधेरों में खो गए होते।
इसके बाद SLV-3 की दूसरी उड़ान 18 जुलाई, 1980 को आयोजित की गई जिसमें इसे ‘रोहिणी-आरएस-1’ नामक उपग्रह को 400-500 किमी. की ऊंचाई वाली पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करना था। रॉकेट ने ऐसा किया भी लेकिन उसने उपग्रह को वांछित कक्षा से कहीं अधिक ऊंचाई पर स्थापित कर दिया, फलतः उसका जीवनकाल 100 दिनों से बढ़कर एक वर्ष हो गया। यह एक तकनीकी त्रुटि थी जिसका निराकरण जरूरी था लेकिन SLV-3 की अगली उड़ान में भी हम उसे नियंत्रित नहीं कर सके।
एसएलवी-डी3 की तीसरी उड़ान (पहली विकासात्मक उड़ान) और भी दुर्भाग्यपूर्ण रही। 31 मई, 1981 को रॉकेट ने ‘रोहिणी-आरएस-डी-1’ नामक उपग्रह को लेकर उड़ान भरी। पूर्व घोषणा के अनुसार इसे अंतरिक्ष में 300 दिनों तक रहना था पर रॉकेट उसे वांछित कक्षा में पहुंचा ही नहीं सका, फलस्वरूप यह सप्ताह भर में ही गिरकर विनष्ट हो गया।
17 अप्रैल, 1983 को SLV-3 की चौथी और आखिरी उड़ान (दूसरी विकासात्मक उड़ान) आयोजित की गई जिसमें इसने ‘रोहिणी-आरएस-डी2’ नामक उपग्रह की सफल स्थापना की। इसी के साथ भारत अंतरिक्ष क्लब का छठां सदस्य राष्ट्र बन गया। जो राष्ट्र अपने ही रॉकेटों से अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण कर लेते हैं, उन्हें ‘स्पेस क्लब’ में शामिल कर लिया जाता है।
एक निर्णायक मोड़
इस छोटी से सफलता ने भारतीय विज्ञान में एक निर्णायक मोड़ लिया। SLV-3 रॉकेट से ‘रोहिणी-आरएसडी2’ की सफल स्थापना से भारतीय विज्ञान में दो समांतर धाराएं पनपीं।
इसी सफल प्रक्षेपण के साथ छोटे रॉकेटों का एक युग समाप्त हो गया और भारत शनैः शनैः बड़े और शक्तिशाली रॉकेटों के विकास की ओर उन्मुख होता चला गया।
साथ ही साथ जुलाई 1983 में कलाम के ही निर्देशन में भारत के प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम (IGMDP-Integrated Guided Missiles Development Programme) का जन्म हो गया और रातों-रात कलाम ‘मिसाइल मैन’ के रूप में सितारे बन गए। डीआरडीओ के इंजीनियरों के कौशल से 6 वर्षों की लघु अवधि में भारत की पांच प्रक्षेपास्त्र प्रणालियां- पृथ्वी, अग्नि, नाग, आकाश और त्रिशूल-अस्तित्व में आ गईं और भारत शीघ्र ही प्रक्षेपास्त्र शक्ति संपन्न राष्ट्र बन गया।
आगे चलकर हमने ASLV, PSLV और GSLV जैसे रॉकेट बनाए। इनमें से SLV-3 और ASLV जैसी रॉकेट शृंखलाएं समाप्त कर दी गई हैं। हमारा ध्रुवीय रॉकेट (Polar Satellite Launching Vehicle-PSLV) अभी भी अपनी उड़ानें भर रहा है और उसने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
हम ध्रुवीय रॉकेट की सभी उड़ानों की विवृत्ति नहीं दे सकते क्योंकि एक कारण तो स्थानाभाव है और दूसरा यह कि यह मात्र पिष्टपेषण ही होगा क्योंकि हम ‘सम-सामयिक घटना चक्र’ के गतांकों में इन उड़ानों पर विमर्श करते आए हैं। अतः पाठकों के मार्गदर्शन के लिए ‘सम-सामयिक घटना चक्र’ के गतांकों का अवलोकन वांछनीय है फिर भी हम ध्रुवीय रॉकेट की कुछेक उड़ानों की चर्चा करने के अपने लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे हैं।
ध्रुवीय रॉकेट की अब तक 25 उड़ानें आयोजित हो चुकी हैं। इसकी पहली और एकमात्र उड़ान (PSLV-D1; 20 सितंबर, 1993) विफल हुई थी जिसके साथ उपग्रह IRS-IE भी जलकर विनष्ट हो गया था।
इसके बाद ध्रुवीय रॉकेट ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसकी 25वीं और लगातार 24वीं सफल उड़ान 5 नवंबर, 2013 (मिशन PSLV-C25) को आयोजित हुई जिसमें इसने भारत के मंगल यान (Mars Orbiter Mission) को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। यह ‘इसरो’ की बहुत बड़ी उपलब्धि है जिससे विश्व मंच पर भारत का गौरववर्धन हुआ है।
इसके पूर्व ध्रुवीय रॉकेट ने 28 अप्रैल, 2008 की उड़ान (PSLV-C9) में एक साथ 10 उपग्रहों (8 विदेशी) का सफल प्रक्षेपण किया। अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में यह एक रिकॉर्ड है।
आगे चलकर ध्रुवीय रॉकेट ने 22 अक्टूबर, 2008 को (मिशन PSLV-C11) भारत के चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ की चंद्रमा की कक्षा में सफल स्थापना की।
पीएसएलवी की चौथी सफल उड़ान (PSLV-C2) में 26 मई, 1999 को हमने भारतीय उपग्रह ‘ओशनसैट’ के साथ कोरियाई वैज्ञानिक उपग्रह ‘किटसैट-3’ और जर्मन उपग्रह ‘टबसैट’ का सफल प्रक्षेपण किया था। तब से लेकर आज तक ‘इसरो’ ने 28 विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया है। यह भी अपने आप में एक महती उपलब्धि है।
प्रायः 20 वर्षों से हम भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी के विकास की दिशा में सन्नद्ध थे जिसके तीसरे और सबसे ऊपरी चरण में क्रायोजेनिक इंजन संलग्न होता है। (देखिए, ‘सम-सामायिक घटना चक्र’, जनवरी-फरवरी, 2013, पृष्ठ 5-8) एक समझौते के अनुसार रूस ने हमें क्रायोजेनिक इंजन और उसके तकनीकी ज्ञान के हस्तांतरण का अनुबंध किया था, मगर अमेरिकी दबाव में उसने तकनीकी ज्ञान देने से इनकार कर दिया, अलबत्ता उसने 6 इंजनों की बजाय क्षतिपूर्ति के रूप में 7 इंजनों की आपूर्ति कर दी।
बहरहाल, रूस द्वारा प्रदत्त 7 क्रायोजेनिक इंजनों में से हम 6 इंजनों का इस्तेमाल कर चुके हैं जिसमें मात्र 3 उड़ानों में ही हमें सफलताएं मिलीं, बाकी फ्लॉप शो रहे।
अंततोगत्वा स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन संलग्न मिशन GSLV-D5 की सफल उड़ान 5 जनवरी, 2014 को आयोजित हुई।
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से GSLV-D5 ने 5 जनवरी, 2014 को सायं 4.18 बजे उड़ान (आठवीं) भरी। लिफ्ट ऑफ के 5 मिनट बाद स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन में प्रज्ज्वलन आरंभ हुआ और इसने 720 सेकंड तक जलकर 1982 किग्रा. वजनी भारत के संचार उपग्रह ‘जीसैट-14’ को भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर दिया।
‘इसरो’ के इंजीनियरों की मेहनत रंग लाई और इस प्रकार ‘इसरो’ की चुनौतियों और आशंकाओं पर विराम लग गया। अब भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो गया है। इस सफल प्रक्षेपण से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरववर्धन हुआ है।
हम भाग्यशाली हैं कि ‘इसरो’ की रॉकेटरी की स्वर्ण जयंती के साक्षी हैं। आने वाली पीढ़ियां इसे हसरत की निगाह से देखेंगी। सर्वतो भद्र!
स्रोत :- घटनाचक्र